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चलो कुकरमुत्तो अब लोकसभा में होगी मुलाकात

( पत्रकार मनीष तिवारी की फेसबुक  से )
राष्ट्र चंडिका सिवनी. जिले, प्रदेश और देश में इन दिनों कुकुरमुत्तों की भरमार हो गई है। मीडिया जगत की बात करें तो आज की तारीख में ए न्यूज, बी न्यूज से लेकर जेड न्यूज जैसे तथाकथित मीडिया चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। कई लोकप्रिय और स्वनामधन्य अखबारों के नाम पर भी वेब पोर्टल और वेब चैनलों की भरमार है। अभी महीने दो महीने पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट की बारिश के बाद ये सैकड़ों कुकुरमुत्ते उतर आए। विधानसभा चुनाव अब समाप्ति पर हैं ऐसे में इनकी भी विदाई तय है।  गुस्सा आता है… यह कांग्रेस का स्लोगन मात्र नहीं है बल्कि इस तरह के धूर्त मीडियाकर्मियों को देखकर गुस्सा आता है। बीते पांच सालों में जो लोग मीडिया के कमरों में हर दिन नौकरी का आखिरी दिन मानकर गदहे की तरह मेहनत करते रहे। मेहनत की, राजनेताओं की तारीफ, बुराई और सारी खबरें चलाई छापीं। जब फसल पकने का वक्त आया तो कुकुरमुत्ते आ गए सारी मिठाई और मलाई चाटने। पांच सालों की सुसुप्ता अवस्था के बाद ऐन चुनाव के वक्त उगने वाले ये कुकुरमुत्ते जितना मीडिया का अहित करते हैं। उतना शायद कोई नहीं करता। अक्सर जिले और प्रदेश में गिने चुने दस-१५ बैनर ही नजर आते हैं लेकिन चुनावों के वक्त इनकी संख्या में इतना इजाफा हो जाता है कि क्या कहें। राजधानी में इनके आकाओं ने दुकानें खोल रखी हैं। जो किसी पत्रकारिता विद्यालय के नए नवैलों को तीन चार हजार रुपए की रकम का लालच देकर अपने आफिस में बैठा लेते हैं। इसके बाद चंडीगढ़ और इसी तरह के दूसरे इलाकों से जहां के अधिकांश लोग एनआरआई हैं और जिनके पास पैसे तो हैं लेकिन खर्चने का कोई उपाय नहीं वे एक दो चैनलों का रजिस्ट्रेशन कराए बैठे रहते हैं। जिन चैनलों में अक्सर गुरबानी और दूसरे धार्मिक आयोजन चलते रहते हैं में ऐसे लोग कुछ टाईम स्लाट ३५-५० हजार रुपए में खरीद लेते हैं। फिर इनके राजधानी के दफ्तर में जिले भर से आए लोगों से नगद राशि लेकर प्लास्टिक की आईडी देने का सिलसिला शुरू होता है। दस-पचास हजार रुपए देकर एक आईडी लेकर आए ये कुकुरमुत्ते पुराने पत्रकारों जिनकी रोजी रोटी का साधन ही पत्रकारिता है के आगे आईडी मटकाकर कहते हैं कि भैया कोई खबर हो तो हमें भी बता देना। फिर चुनावों के दौरान मोबाइल के कैमरों से बाइट, इंटरव्यूह लेने का सिलसिला शुरू होता है और इंटरव्यूह के बाद धीरे से प्रत्याशी से कान में कहते हैं भैया मीडिया का मैनेजमेंट कौन देख रहा है। इसके बाद पांच सौ, हजार जो मिल जाए ले लेते हैं। आजकल तो इन चैनलों की लिंक आ जाती है जिसे देकर खुद को बड़ा से भी बड़ा पत्रकार साबित कर दिया जाता है। प्रत्याशी भी …. से बड़े इन लोगों को कुछ कह नहीं पाता। ये ही लोग हैं जिनके कारण मजीठिया वेतनमान नहीं मिल पा रहा। राजनेताओं को मालूम है कि देश में बेरोजगारी किस कदर है और किस कदर ये मौसमी पत्रकार हैं। ऐसे में पत्रकारों का हित क्यों किया जाए। जिन शिक्षाकर्मियों के साथ हमने पत्रकारिता की शुरूआत की थी आज उनके पास घर है, गाड़ी है, नौकर चाकर बंगला हैं और हमारे पास सिर्फ सरस्वती मां है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके पुत्रों का लक्ष्मी से आदि काल से बैर है। रही बात मालिकों की तो उन्हे भी पता है कि बेरोजगारी के मारे सैकड़ों छोडि़ए लाखों हैं। तो फिर चलिए वहीं वापस लौटते हैं कुुकुरमुत्तों की विदाई का वक्त आ चुका है। 11 को नतीजों की घोषणा के साथ ही एक दो दिन दिखने के बाद कुकुरमुत्ते गायब हो जाएगें परिदृश्य से.. फिर नजर आएंगे हम जैसे लोग। तो चलो कुकुरमुत्तो इजाजत लो, समेट लो अपना बोरिया बिस्तर, फिर चले जाओ सुसुप्तावस्था में मुलाकात होगी अब लोकसभा चुनावों में …………।

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