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नवरात्रि में यहां गरबा खेलने आती है देवी मां

झाबुआ के ग्राम देवीगढ में स्वयं भू-माता का मंदिर पदमावती नदी के तट एव ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। जिसकी प्राकृतिक सौंदर्य व अलौकिक छटा सभी को अपनी और आकर्षित करती है। प्राचीन समय से ही उक्त स्थान की अंचल सहित म.प्र. सीमावर्ती गुजरात व राजस्थान के सुदूर ग्रामों तक ख्याति है। बताया जाता है देवीगढ़ में बड़ी संख्या में श्रृद्धालु माता के दर्शन हेतु आते हैं। जिसकी नवरात्रि में संख्या बढ़ के दोगुनी-चौगुनी हो जाती है। इसके साथ ही बताते हैं कि चैत्र नवरात्रि में यहां अंचल का प्रसिद्ध स्वयं भू-माता का मेला भी लगता है जिसमें लाखों लोग दूर-दूर से सम्मिलित होने आते हैं। बता दें अंचल में इसे छोटी पावागढ़ के नाम से जाना जाता है।

मंदिर की प्राचीनता पूर्णतः जनश्रुती पर आधारित है। प्रचलित किंवदंती के अनुसार नदी के उत्तरी तट पर प्राचीन काल में कुलम्बी पाटीदार समाज प्रतिवर्ष बैलगाड़ियों मे खाने-पीने का सामान लाद कर पावागढ़ देवी दर्शनार्थ को जाया करते थे। बैलगाड़ियों को स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोग जो कि पाटीदारों के यहां हालीपना कृषि मज़दूरी के रूप में कार्य करते थे हंकाल कर ले जाते थे। यात्रा तत्तसमय के आवागमन के दुर्गमरास्तों के कारण काफी कठिन मानी जाती थी। बैलगाड़ी चलाने वाले आदिवासी मज़दूर भी बड़ी श्रद्धा भाव से यात्रा के साथ जाते थे। इन्हीं में से स्थानीय सिंगाड़िया परिवार का एक व्यक्ति जो इस वर्षो से इस कार्य को करता था वृद्धावस्था में होने से उसने पावागढ़ वाली माता से प्रार्थना की कि माता अब मेरे अंदर तेरे दर पर आने की शक्ति नहीं है कृपा करने आप मेरे गांव की पहाड़ी पर प्रकट होकर दर्शन दें।

भक्त के वस में है भगवान। अब ये कहावत आप सब ने सुनी ही होगी। बस ये कहावत चरितार्थ हुई और गांव के भक्त को स्वप्न में माता ने आदेश दिया की मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं और पहाड़ी पर मेरा रूप तुझे दिखेगा।

दूसरे दिन सुबह लखा सिंगाड़िया ने स्वप्न की बात गांव में बताई और सभी गांव के लोग पहाड़ी पर गए देखा तो वहां माता की प्रतिमा विराजित थी जिस पर सिंदूर लगा हुआ था। जिसके बाद धीरे-धीरे ये बात पूरे क्षैत्र जंगल में आग की फैल गई और माता रानी के दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया। उसके बाद से इस वनांचल के सीमावर्ती राजस्थान, गुजरात, व मालवा क्षैत्र से लोग बड़ी संख्या में आने लगे। इतना ही नहीं बल्कि यहां माता जी के अनेक चमत्कारों की घटनाएं सामने आने लगी।

कालान्तर में प्रचलित जनश्रुती के अनुसार नवरात्रि में माता जी के गरबे होने लगे। जिस दौरान एक घटना सामने आई कि गरबों में माताजी स्वयं भेस बदलकर गरबा खेलती थी। गांव के किसी व्यक्ति द्वारा अजनबी महिला को गरबे खेलता देखकर बुरी नियत रखते हुए उसका पीछा किया। जिसके बाद माता रानी तो अदृश्य हो गई लेकिन उनके श्राप से देवीगढ़ ग्राम की सारी आबादी महामारी की चपेट में आ गई। गांव की आबादी यहां से घर छोड़ अपनी जान बचाने के लिए चले गए और दूर दराज के गांव में जाकर बस गए।

कहा जाता है आज भी गांव में खेतों में प्राचीन आबादी के भग्नावशेष मौजूद है। क्षैत्र में दूर दराज फेले कुलम्बी पाटीदार जहां माता जी को इष्टदेवी माना जाता है। यहां पूरा साल विभिन्न अवसरों पर आकर भक्त अपनी परिवार की सुख शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा बता दें सिंगाडिया परिवार व अंचल का आदिवासी इसे अपनी कुलदेवी इष्टदेव के रूप में मानते हैं।

जावेद पठान की रिपोर्ट के अनुसार कहा जाता है प्राचीन समय में यहां मात्र पूर्णिमा को ही मैला लगता था तत्कालिन झाबुआ के राजा उदयसिंग ने मेले की अवधि एक दिन से बढ़ाकर 7 दिन की और राज्य की और से व्यापारियों को दूकानें लगाने की अनुमति थी। आज के समय में ग्राम पंचायत इस मैले को सम्पन्न करवाती है।

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