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जैविक गुड़ बनाने वाले किसान को मिल रहे हैं तीन गुना दाम

नरसिंहपुर। स्वास्थ्य के प्रति लोगों की बढ़ती जागरूकता के कारण जैविक तरीके से उत्पादित कृषि उपजों, अन्य उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है। लोग खाने- पीने की सामग्री में शुद्धता को तरजीह देते हैं, भले ही थोड़ा अधिक दाम क्यों न देना पड़े। नरसिंहपुर जिले के चीचली विकासखंड के ग्राम बटेसरा के किसान रविशंकर जैविक तरीके से खेती करते हैं। वे जैविक तरीके से गन्ना लगाते हैं। अपनी फसल में केवल गोबर की खाद का उपयोग करते हैं। खेत पर ही जैविक गुड़ बनाते हैं। उनके द्वारा किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार के रसायन का उपयोग नहीं होता है। उनके द्वारा तैयार गुड़ घर से ही हाथों- हाथ बिक जाता है, वह भी ढाई से तीन गुनी कीमत पर। उन्होंने इस सीजन में अब तक 80 क्विंटल जैविक गुड़ बेचा है। उन्हें प्रति किलो गुड़ के 70 रूपये के भाव मिले। उन्होंने इस वर्ष 6 एकड़ में गन्ना लगाया था।
40 वर्षीय किसान रविशंकर बीए तक शिक्षित हैं। वे पिछले पांच वर्षों से जैविक खेती कर रहे हैं। उनके पास 12 एकड़ खेती की जमीन है। उन्होंने जैविक खेती का रकबा धीरे-धीरे बढ़ाया है। वे दूसरे फसलें भी जैविक तरीके से लगाते हैं। रविशंकर मिश्रित पद्धति से गन्ने के साथ- साथ चना और गेहूं की फसल भी लगा रहे हैं।
रविशंकर बताते हैं कि जैविक खेती में लागत नहीं के बराबर है। गोबर और गौमूत्र किसान के यहां आसानी से उपलब्ध है। शुरू में उत्पादन कम होता है, फिर धीरे- धीरे बढ़ने लगता है। वे अपनी फसल में हर 20 दिन में एक बार जीवामृत का छिड़काव करते हैं। जीवामृत 10 किलो गाय का गोबर, 5 लीटर गौमूत्र, एक किलो गुड़, एक किलो बेसन और एक किलो पेड़ के नीचे की मिट्टी से तैयार किया जाता है। इसे तीन से 7 दिन रखकर 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ में सिंचाई करते हैं। फसल में कीटव्याधि से मुक्ति के लिए गौमूत्र का भी समय- समय पर छिड़काव करते हैं। कृषि विभाग के सहायक संचालक गन्ना डॉ. अभिषेक दुबे किसान रविशंकर की जैविक खेती की सराहना करते हैं। डॉ. दुबे कहते हैं कि जैविक खेती आज की आवश्यकता है। नरसिंहपुर जिले की भौगोलिक परिस्थिति और मिट्टी जैविक खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। राज्य शासन जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कदम उठा रहा है।

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