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क्या एक बार हरतालिका तीज व्रत रख लेने पर आजीवन निभाना ज़रूरी है,विशेष परिस्थिति में क्या करें?

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हरतालिका तीज का व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है. यह व्रत मुख्य रूप से सौभाग्य, अखंड पति सुख और दांपत्य जीवन की लंबी उम्र के लिए किया जाता है. पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने कठोर तप करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था. यही कारण है कि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं.

भाद्रपद मास की तृतीया को रखा जाने वाला हरतालिका तीज व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे पवित्र पर्व माना जाता है. इस दिन माता पार्वती ने तप कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया था. मान्यता है कि यह व्रत न केवल पति की दीर्घायु देता है बल्कि दांपत्य जीवन की हर मुश्किल को आसान करता है. लेकिन अक्सर महिलाओं के मन में सवाल उठता है कि क्या हरतालिका तीज का व्रत एक बार रखने पर आजीवन निभाना जरूरी है?

क्या एक बार शुरू करने पर जीवनभर करना अनिवार्य है?

अक्सर महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि यदि एक बार हरतालिका तीज का व्रत शुरू कर दिया तो क्या इसे आजीवन करना पड़ता है? धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार तीज व्रत का महत्व बहुत बड़ा है और इसे बहुत पुण्यकारी माना गया है. मान्यता है कि एक बार जब कोई महिला यह व्रत आरंभ करती है तो उसे यथासंभव जीवनभर इसे निभाना चाहिए. क्योंकि यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन की कथा से जुड़ा हुआ है और इसे बीच में छोड़ना शुभ नहीं माना जाता.

विशेष परिस्थिति में क्या करें?

हालांकि, यदि स्वास्थ्य कारणों, वृद्धावस्था या किसी अन्य मजबूरीवश महिला हर साल यह व्रत नहीं कर पाती तो धार्मिक मान्यता कहती है कि उसे मन ही मन भगवान शिवपार्वती का ध्यान करके व्रत का संकल्प छोड़ने की अनुमति है. कई स्थानों पर परंपरा है कि ऐसी स्थिति में कोई अन्य महिला (परिवार की बहू या बेटी) उस व्रत को आगे निभाती है.

धार्मिक दृष्टिकोण से लाभ

कहा जाता है कि तीज व्रत न केवल वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाता है बल्कि स्त्री के जीवन से अनेक कष्ट भी दूर करता है.यह व्रत जीवनसाथी के प्रति समर्पण और निष्ठा का प्रतीक है. यही वजह है कि महिलाएं इसे पूरे उत्साह और श्रद्धा से करती हैं. हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी माना जाता है. एक बार इसे आरंभ करने पर आजीवन निभाने की परंपरा जरूर है, लेकिन यदि असमर्थता हो तो शिवपार्वती के ध्यान और संकल्प त्याग की अनुमति भी शास्त्रों में दी गई है.

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