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Iran-Israel Conflict: युद्ध से वैश्विक खाद्य संकट का खतरा, 40% महंगी हो सकती है खाने की चीजें; कच्चा तेल $120 के पार होने की आशंका

पश्चिम एशिया में इस समय जो तनाव चल रहा है, वह अब सिर्फ सीमाओं का विवाद नहीं रह गया है. यह तेजी से एक ऐसे वैश्विक खाद्य संकट में बदल रहा है, जिसकी तपिश बहुत जल्द आपकी रसोई तक पहुंचने वाली है. वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के मुताबिक, अगर यह युद्ध जून तक ऐसे ही खिंचता है, तो दुनिया भर में 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर भुखमरी का शिकार हो जाएंगे. यह आंकड़ा मौजूदा 31.9 करोड़ के डरावने रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा.

ईरान युद्ध से कैसे बढ़ रही रसोई की महंगाई

इस पूरे संकट के केंद्र में होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) है, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक रास्तों में से एक है. 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी-इजराइली हमलों के बाद से ही यहां मानवीय सहायता और व्यापार के रास्ते चोक हो गए हैं. दुनिया का 20% तेल और गैस इसी संकरे रास्ते से गुजरता है. ईरान द्वारा इस रास्ते को लगभग ‘बंद’ किए जाने के संकेतों के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं. सुरक्षा कारणों से जहाजों को लंबे रास्तों से भेजा जा रहा है, जिससे माल ढुलाई 18% तक महंगी हो गई है. कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा मतलब है खेतों में ट्रैक्टर चलाने, सिंचाई करने और मंडियों तक अनाज पहुंचाने का खर्च बढ़ जाना.

असली विलेन कच्चा तेल नहीं, बल्कि यूरिया है

मनी कंट्रोल की एक खबर के मुताबिक, इस जंग से भले ही तेल की कीमतों पर केंद्रित हों, लेकिन खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और छिपा हुआ खतरा फर्टिलाइजर (उर्वरक) का संकट है. दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले यूरिया का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी देशों से होर्मुज के रास्ते ही दुनिया भर में पहुंचता है. अकेले कतर दुनिया के कुल यूरिया उत्पादन में 14% का योगदान देता है.

लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण कतर ने अपने विशाल यूरिया कारखानों में उत्पादन रोक दिया है. गैस की इसी कमी के कारण भारत को भी अपने कई यूरिया प्लांट का उत्पादन घटाना पड़ा है, क्योंकि यहां गैस की उपलब्धता 70% तक गिर गई है. पड़ोसी देश बांग्लादेश में तो गैस की राशनिंग के चलते कई कारखाने बंद ही हो गए हैं. जिसके चलते मध्य पूर्व से यूरिया के निर्यात की कीमतें हाल के हफ्तों में 40% तक बढ़ गई हैं और पिछले साल के मुकाबले यह 60% ज्यादा महंगी हो चुकी हैं.

गलत समय पर आया है संकट

यह संकट दुनिया के लिए सबसे गलत समय पर आया है. उत्तरी गोलार्ध में इस समय मुख्य बुवाई का मौसम चल रहा है (मध्य फरवरी से मई की शुरुआत तक). फसल की अच्छी पैदावार के लिए इस समय किसानों को खादों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. जब खाद दोगुनी महंगी होगी या बाजार में मिलेगी ही नहीं, तो किसान क्या करेंगे? मजबूरी में वे खाद का इस्तेमाल कम करेंगे. इसका सीधा असर चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी हमारी बुनियादी फसलों की पैदावार पर पड़ेगा.

भारत, जो अपना 40% से ज्यादा उर्वरक मध्य पूर्व से मंगाता है, वह चावल और गेहूं का प्रमुख निर्यातक है. ब्राजील अपने सोयाबीन के लिए पूरी तरह से आयातित उर्वरकों पर निर्भर है. इन देशों की कृषि उपज में थोड़ी सी भी कमी पूरी दुनिया के खाद्य बाजार को हिला कर रख देगी.

महंगाई का बम कभी भी फट सकता है

खेती की लागत बढ़ने और अनाज का उत्पादन घटने का अंतिम बोझ आम उपभोक्ता पर ही गिरता है. जब गेहूं और चावल की पैदावार कम होगी, तो बाजार में इनकी कमी होगी और कीमतें आसमान छूने लगेंगी. भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सरकार पर फर्टिलाइजर सब्सिडी का भारी बोझ पड़ेगा, जो अंततः महंगाई के रूप में सामने आएगा. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक खाद्य आपूर्ति पहले ही दबाव में थी और अब इस नए संकट ने एक कमजोर सिस्टम को ढहने की कगार पर ला खड़ा किया है.

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