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Mohan Bhagwat News: ‘युवाओं को अब आदेश नहीं दे सकते, उनसे संवाद जरूरी’, दिल्ली में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली के आंबेडकर भवन में विश्वमांगल्य सभा के ‘युगानुकूल मातृत्व’ कार्यक्रम में युवाओं को लेकर बड़ी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी अब सवाल करती है। हम सवाल नहीं करते थे, लेकिन अब का दौर अलग है। युवाओं से संवाद की जरूरत है, उन्हें अब ऑर्डर नहीं दिया जा सकता। नई पीढ़ी विश्लेषण करती है। बदलते फैमिली वैल्यू सिस्टम में युवाओं के साथ संवाद पर जोर देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि जिस शैली में हम पहले बात करते थे, अब हमें उसको बदलना होगा।

📜 ‘पहले आज्ञा पालन का जमाना था, लेकिन अब नई पीढ़ी को तर्क बताना पड़ता है’

आरएसएस चीफ ने कहा कि पहले आज्ञा पालन का जमाना था। माता-पिता ने जो कहा, उस पर कोई बहस नहीं होती थी—चुप यानी चुप। उन पर हमारी श्रद्धा भी थी। हमको मालूम था कि इन्होंने जीवन देखा है, इनके अनुभव से ही सब ठीक रहेगा।

📱 परिवारों में बातचीत बंद होना चिंताजनक, भागवत बोले—’घर में सब मोबाइल लेकर बैठे रहते हैं’

संघ प्रमुख ने कहा कि अब ऐसा नहीं है, नई पीढ़ी सवाल पूछती है। उनको तर्क बताना पड़ता है। इनको समय देने की जरूरत है और संवाद करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज परिवार में बातचीत बंद हो गई है। परिवार में हर एक आदमी अपना-अपना मोबाइल लेकर बैठा है। बाहर से कोई मिलने के लिए आ गया, तो उनकी भी सुध नहीं लेता। इसको बदलना पड़ेगा, तभी समय मिलेगा। जब समय मिलेगा तो बात होगी और गपशप में बच्चा खुलकर कुछ बोलेगा।

👨‍👩‍👧‍👦 12 साल तक परवरिश हमारे हाथ में, बच्चों को वही बताएं जो हम खुद करते हैं

उन्होंने कहा कि बच्चों की परवरिश पहले 12 साल तक अपने हाथ में रहती है। जब हम सीखेंगे, तभी उसके आधार पर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान कर सकेंगे। जो हम उनको बताएंगे, वह हमारे अपने जीवन में भी उनको दिखना चाहिए। नई पीढ़ी अब ऐसे ही बात नहीं मानेगी, जो आप कर रहे हो, वही बोलो क्योंकि वे हर बात का विश्लेषण करते हैं।

🌸 ‘माता मनुष्य की पहली शिक्षक और गुरु है’, संघ प्रमुख ने बताया मातृत्व का महत्व

वहीं महिलाओं पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि मातृत्व सृष्टि के संवर्धन, पोषण और निरंतरता का मूल आधार है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति विचार है, लेकिन उसे सही दिशा देने का कार्य माता करती है। माता मनुष्य की पहली शिक्षक और गुरु होती है। जीवनभर व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है, जिसका सबसे बड़ा केंद्र माता है।

📚 विदेशी शासन और ब्रिटिश नीतियों से अपनी ज्ञान-परंपराओं की उपेक्षा हुई

मनुष्य चिंतन, अनुकरण और अनुभव से सीखता है तथा समय के साथ स्वयं को बदलता है। आक्रमणों और विदेशी शासन के कारण समाज को कई बदलाव स्वीकार करने पड़े। ब्रिटिश शासन के दौरान हमने अपने ज्ञान और परंपराओं की उपेक्षा की। आज समाज में विवाह, परिवार और मातृत्व को भी लेन-देन या सौदे की दृष्टि से देखा जाने लगा है।

🏛️ आधुनिकता के नाम पर सांस्कृतिक मान्यताओं को पीछे छोड़ना गलत: मोहन भागवत

वहीं व्यक्तिवाद बढ़ने से परिवार और सामाजिक दायित्वों के प्रति उदासीनता आई है। आधुनिकता के नाम पर हमने अपनी कई मूलभूत सांस्कृतिक मान्यताओं को पीछे छोड़ दिया। विवाह को आज एक बंधन के रूप में देखा जा रहा है, जिससे परिवार व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है। समाज को मानव इतिहास और भारतीय दृष्टिकोण के आधार पर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

🌿 भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को अपनाएं, स्वार्थ तक सीमित न रखें रिश्ते

भारत में रहते हुए भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को अपनाना चाहिए। दूसरे देशों की जीवनशैली को ज्यों का त्यों लागू नहीं करना चाहिए। सृष्टि का निर्माण, पालन-पोषण और उसकी निरंतरता मातृत्व के बिना संभव नहीं है। मातृत्व ही सृजन और जीवन के पोषण का मूल आधार है। आज लोग पूछते हैं कि विवाह क्यों करें, परिवार की जिम्मेदारियां क्यों निभाएं और समाज से हमारा क्या संबंध है। जीवन केवल आनंद के लिए है—ऐसी सोच में रिश्ते केवल स्वार्थ और लेन-देन तक सीमित हो जाते हैं। लंबे समय तक यह भ्रम फैलाया गया कि हमारी परंपराएं गलत हैं, जबकि हमारी सांस्कृतिक नींव अत्यंत मजबूत है। हमें अपने इतिहास, ज्ञान और परंपराओं पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

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