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बिहार में शराबबंदी लागू होने के एक दशक बाद फिर छिड़ी बहस, NCAER रिपोर्ट के बाद जीतन राम मांझी का बड़ा बयान

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पटना (बिहार): बिहार में अप्रैल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून के लगभग एक दशक बीत जाने के उपरांत इसे लेकर एक बार पुनः राज्य की राजनीति एवं प्रशासनिक गलियारों में गरमा-गर्मी तेज हो गई है।

हाल ही में नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के पश्चात केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बिहार में शराबबंदी का ‘गुजरात मॉडल’ (Gujarat Model) लागू करने का सुझाव दिया है। मांझी के इस बयान के सामने आते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के मध्य तीखी बहस प्रारंभ हो गई है।

❌ ’12 लाख गरीबों पर केस, अफसर बना रहे अवैध कमाई’: जीतन राम मांझी ने कानून पर उठाए सवाल

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में वर्ष 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किया गया था।

इसके बाद से ही समय-समय पर इस सख्त कानून की व्यावहारिक समीक्षा की मांग उठती रही है। राज्य में शराब की अवैध आपूर्ति, नशीले पदार्थों (सूखे नशे) का बढ़ता प्रचलन और जहरीली शराब से होने वाली मौतों के कारण यह कानून निरंतर कटघरे में रहा है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने आरोप लगाया कि इस कानून के तहत अब तक करीब 12 लाख लोगों पर मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें अधिकांश निर्धन वर्ग के लोग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस कड़े कानून की आड़ में कुछ भ्रष्ट अधिकारी अवैध धनार्जन कर रहे हैं।

💰 ‘राजस्व बढ़ाने के अन्य स्रोत खोजे सरकार, शराबबंदी खत्म करना समाधान नहीं’: चिराग पासवान

इसी बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने शराबबंदी के मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए अपना पक्ष प्रस्तुत किया है।

चिराग पासवान ने कहा कि राज्य सरकार को अपने वित्तीय राजस्व (Revenue) को सुदृढ़ करने हेतु अन्य वैकल्पिक साधनों की तलाश अवश्य करनी चाहिए, किंतु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि शराबबंदी कानून को पूरी तरह निरस्त कर दिया जाए। बता दें कि NCAER की रिपोर्ट में बिहार में पूर्ण शराबबंदी समाप्त कर नियंत्रित बिक्री और आबकारी शुल्क व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की गई है।

📊 क्या बिहार में समीक्षा के बाद खत्म होगी शराबबंदी? NCAER की रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल

NCAER द्वारा जारी व्यापक रिपोर्ट में राज्य को हो रहे भारी राजस्व नुकसान, समानांतर अवैध शराब के कारोबार और शराबबंदी के सामाजिक व आर्थिक दुष्प्रभावों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

इस बहुचर्चित रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही उभर रहा है कि क्या बिहार सरकार इस कानून की समीक्षा करने या इसे समाप्त करने की ओर कदम बढ़ाएगी?

🛡️ ‘शराबबंदी कानून न खत्म होगा और न समीक्षा होगी’: JDU ने रुख किया पूरी तरह स्पष्ट

एनडीए (NDA) के भीतर से ही शराबबंदी को लेकर उभरे भिन्न-भिन्न सुरों के मध्य सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने आधिकारिक बयान जारी कर सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है।

जदयू प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि बिहार में शराबबंदी कानून किसी भी परिस्थिति में खत्म नहीं किया जाएगा और न ही वर्तमान में इस ऐतिहासिक निर्णय की किसी प्रकार की समीक्षा का कोई प्रस्ताव विचाराधीन है।

🔍 जानिए क्या है शराबबंदी का ‘गुजरात मॉडल’ जिसकी मांझी कर रहे हैं मांग?

गुजरात राज्य में वर्ष 1960 से शराबबंदी प्रभावी रूप से लागू है, जो ‘गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949’ पर आधारित है।

गुजरात मॉडल की मुख्य विशेषता यह है कि वहाँ राज्य के आम नागरिकों के लिए शराब के निर्माण, क्रय-विक्रय और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध है, किंतु बाहरी पर्यटकों, व्यावसायिक प्रतिनिधियों और विदेशी अतिथियों के लिए ऑनलाइन परमिट प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित रूप से शराब उपलब्ध कराने का विशेष प्रावधान किया गया है।

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