कश्मीर पर अमेरिका की नीति में बड़ा बदलाव: श्रीनगर पहुंचे अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर, अलगाववाद को दरकिनार कर भारत से साझेदारी पर जोर
श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर): किसी भी शीर्ष अमेरिकी राजनयिक का जम्मू-कश्मीर दौरा कूटनीतिक दृष्टिकोण से हमेशा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, विशेष रूप से जब वह राजधानी श्रीनगर का दौरा करे।
भारत में अमेरिका के 27वें राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए वॉशिंगटन के विशेष दूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर का दौरा किया। वह उन चुनिंदा अमेरिकी राजनयिकों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने कश्मीर घाटी की धरती पर अपने कदम रखे हैं। ऐतिहासिक रूप से विवादों और संवेदनशील बयानों से घिरे रहने वाले इस क्षेत्र में अमेरिकी राजदूत की यह यात्रा भारत-पाकिस्तान संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और वॉशिंगटन की बदली हुई विदेश नीति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
🤝 मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात, गोर बोले—’जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग’
राजधानी श्रीनगर में अमेरिकी राजदूत ने केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से शिष्टाचार एवं द्विपक्षीय मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की:
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सकारात्मक बैठक: मुलाकात के उपरांत राजदूत गोर ने कहा, “यह जगह बेहद खूबसूरत है और यहां आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई। जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है। मैं पहली बार यहां आया हूं और यहां के वातावरण को देखकर बेहद उत्साहित हूं। हमारी बैठक बहुत सकारात्मक रही और हम द्विपक्षीय संबंधों को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं।”
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मध्यस्थता के दावे खारिज: यह दौरा अमेरिकी मध्यस्थता के उन सभी दावों के बीच हुआ जिसे नई दिल्ली हमेशा सिरे से खारिज करती रही है। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि दोनों देशों के बीच सभी सैन्य और कूटनीतिक चैनल सीधे और द्विपक्षीय स्तर पर संचालित होते हैं।
🕊️ आतंकवाद के खात्मे के बाद बदली घाटी की तस्वीर, सुरक्षा और अमन पर जोर
वर्षों के संघर्ष के बाद अब कश्मीर घाटी के जमीनी हालात में व्यापक और बुनियादी परिवर्तन आया है:
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शांति की पुनर्स्थापना: आतंकवाद का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और अलगाववादी राजनीति अप्रासंगिक हो चुकी है।
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विकास की मुख्यधारा: अनुच्छेद 370 के निरसन और संवैधानिक पुनर्गठन के बाद से घाटी में अभूतपूर्व विकास, पर्यटन और शांति का माहौल बना है।
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वॉशिंगटन का बदला रुख: पूर्व के दशकों में जहां वॉशिंगटन का रवैया ढुलमुल रहता था, वहीं अब बदले हालात में अमेरिकी राजदूत ने सीधे तौर पर कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा स्वीकार कर स्थिरता का समर्थन किया है।
📜 1990 के दशक से अब तक: अमेरिकी कूटनीति का विवादित इतिहास
अतीत में अमेरिकी राजदूतों के कश्मीर दौरे अक्सर गंभीर राजनीतिक विवादों और तनाव का कारण बनते रहे हैं:
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1995 (फ्रैंक विस्नर का दौरा): जब घाटी में आतंकवाद चरम पर था और कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, तब अमेरिकी राजदूत फ्रैंक विस्नर ने मुख्यधारा के नेताओं के साथ-साथ अलगाववादी गुटों से भी मुलाकात की थी, जिसकी तीखी आलोचना हुई थी।
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1999 (कारगिल युद्ध): कारगिल संघर्ष के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर दबाव बनाकर नियंत्रण रेखा (LoC) से सेना पीछे हटाने को बाध्य किया था।
🛡️ 9/11 हमले के बाद आतंकवाद-रोधी नीति और द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी
वर्ष 2001 में अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमले के बाद वॉशिंगटन की नीति में सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग प्राथमिकता बन गया:
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2002 (रॉबर्ट ब्लैकविल): तत्कालीन राजदूत ने एलओसी का हवाई निरीक्षण किया, लेकिन अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत अलगाववादियों से पूरी तरह दूरी बनाए रखी।
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2011 एवं 2020: राजदूत टिमोथी रोमर ने 2011 में संस्थागत संवाद किया, जबकि 2020 में संवैधानिक बदलावों के बाद राजदूत केनेथ जस्टर विदेशी प्रतिनिधिमंडल के साथ घाटी पहुंचे।
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मजबूत रणनीतिक साझेदारी: आज भारत-अमेरिका संबंध पारंपरिक दक्षिण एशियाई तनावों से कहीं ऊपर उठकर रक्षा तकनीक, उच्च व्यापार, क्रिटिकल मिनरल्स और वैश्विक सुरक्षा की मजबूत रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। अमेरिकी राजदूत का यह दौरा इसी सुदृढ़ रिश्ते का परिचायक है।
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