बंदूक छोड़ हाथों में थामी राखी: कांकेर पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित नक्सलियों ने बनाईं 700 से ज्यादा राखियां
कांकेर (छत्तीसगढ़): जो हाथ कभी जंगलों में बंदूकें थामते थे, वे हाथ अब समाज की मुख्यधारा से जुड़कर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक ‘राखी’ तैयार कर रहे हैं। उत्तर बस्तर कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर स्थित चौगेल पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित एवं पुनर्वासित नक्सलियों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से राखी निर्माण का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे इन परिवारों के लिए प्रशासन की यह पहल बदलाव की एक नई और सुखद तस्वीर पेश कर रही है।
🧵 ‘बिहान’ योजना के तहत मिला प्रशिक्षण, अब तक तैयार कीं 700 से अधिक आकर्षक राखियां
प्रशिक्षण और उत्पादन की स्थिति:
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बिहान योजना से जुड़ाव: छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के अंतर्गत सरेंडर्ड नक्सलियों और उनके परिजनों को रंग-बिरंगी व आकर्षक राखियां बनाने का हुनर सिखाया गया है।
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700 से अधिक राखियां तैयार: पुनर्वास केंद्र में उत्साहपूर्वक काम करते हुए इन परिवारों ने अब तक 700 से ज्यादा खूबसूरत राखियां तैयार कर ली हैं।
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प्रशिक्षक दल: राखी निर्माण का यह कौशल विकास प्रशिक्षण संकुल संगठन केवटी के अंतर्गत मास्टर ट्रेनर कमला तारम और पार्वती आंचले द्वारा प्रदान किया गया।
💬 पहली बार मनाएंगे रक्षाबंधन: पूर्व नक्सलियों ने साझा किए अपने भावुक अनुभव
पुनर्वासित सदस्यों की जुबानी:
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जुगनी (पूर्व नक्सली): “हम पहली बार राखी बनाना सीखे हैं और इसे बाजार में बेचेंगे। पहले जंगलों में भटकते थे तो कभी रक्षाबंधन नहीं मनाया; इस बार हम राखी का त्यौहार मनाएंगे। हमने 15 अगस्त को पहली बार स्वतंत्रता दिवस भी मनाया था।”
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शीला (पूर्व नक्सली): “पुनर्वास केंद्र में हमें राखी बनाना सिखाया गया है। इस बार हम सब मिलकर रक्षाबंधन मनाएंगे। हमें बहुत अच्छा लग रहा है और यह ट्रेनिंग भविष्य में भी हमारे काम आएगी।”
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नरसिंह नेताम व हीरा लाल (पूर्व नक्सली): “हमने पहले कभी राखी नहीं बनाई थी। ट्रेनिंग मिलने के बाद हम सभी मिलकर राखियां बना रहे हैं और बहुत खुश हैं।”
💼 केवल महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी सीख रहे हुनर; स्थानीय स्तर पर मिलेगा रोजगार
आत्मनिर्भरता और विपणन की कार्ययोजना:
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पुरुषों की भी सक्रिय भागीदारी: इस पहल की खास बात यह रही कि सिर्फ सरेंडर्ड महिला नक्सलियों ने ही नहीं, बल्कि पुनर्वासित पुरुष सदस्यों ने भी राखी निर्माण का प्रशिक्षण लिया और उत्साह से राखियां बनाईं।
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आजीविका और आर्थिक लाभ: इस गतिविधि का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक पर्व को सीधी आजीविका से जोड़ना है। तैयार की गई राखियों के स्थानीय बाजारों में विपणन (मार्केटिंग) की व्यवस्था की जा रही है ताकि इन परिवारों को नियमित आमदनी और आर्थिक मजबूती मिल सके।
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सम्मानजनक जीवन की राह: चौगेल का यह पुनर्वास केंद्र अब हिंसा छोड़ चुके परिवारों को हुनर, रोजगार और आत्मसम्मान देकर समाज में सम्मानपूर्वक जीने का एक मजबूत जरिया बन रहा है।
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