हिरासत में मारपीट पुलिस की ड्यूटी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मियों को राहत देने से किया इनकार
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में नागरिकों के साथ बर्बरता और मारपीट करने के आरोपी पुलिसकर्मियों को किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।
अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि हिरासत में बंद आरोपी को पीटना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं है। पुलिस द्वारा लोगों को रस्सियों से बांधकर बर्बरतापूर्वक पीटना किसी भी परिस्थिति में ऑफिशियल ड्यूटी नहीं माना जा सकता। जस्टिस मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है।
📍 बांदा के बबेरू थाने का है मामला: नोटिस तामील कराने के दौरान हुआ था विवाद
घटना की पृष्ठभूमि और एफआईआर का क्रम:
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मई 2022 की घटना: यह मामला बांदा जिले के बबेरू थाना क्षेत्र का है, जहां मई 2022 में एक मुकदमे की तफ्तीश और नोटिस तामील कराने के लिए पुलिस टीम गांव पहुंची थी।
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पुलिस पर पथराव का आरोप: पुलिस का आरोप था कि ग्रामीणों ने उनके साथ अभद्रता, गाली-गलौज और मारपीट की, पुलिसकर्मियों पर ईंट-पत्थर चलाए और एक कांस्टेबल का मोबाइल फोन भी छीन लिया।
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महिलाओं समेत आठ गिरफ्तार: इस टकराव के बाद भारी पुलिस बल मौके पर भेजा गया और चार महिलाओं सहित कुल आठ ग्रामीणों को गिरफ्तार कर थाने लाया गया था।
⛓️ थाने में बांधकर बेरहमी से पीटने का आरोप: मेडिकल बोर्ड की जांच में खुली पोल
शिकायतकर्ता के आरोप और चोटों का विवरण:
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अमानवीय यातनाएं: शिकायतकर्ता ने पुलिस पर थाने की कस्टडी में घोर बर्बरता का आरोप लगाया।
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रस्सी से बांधकर मारपीट: ग्रामीणों का आरोप है कि थाने के भीतर हाथ-पैर रस्सी से बांधकर उन्हें पेट के बल लिटाया गया और लाठियों से उनके कूल्हों, जांघों व पिंडलियों पर लगातार प्रहार किए गए।
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मेडिकल जांच में पुष्टि: घटना के बाद सभी आठ पीड़ितों का मेडिकल बोर्ड द्वारा परीक्षण कराया गया, जिसमें शरीर के विभिन्न संवेदनशील हिस्सों पर गंभीर चोट, खरोंच और गहरी सूजन की पुष्टि हुई।
🚫 सीआरपीसी धारा 197 की सुरक्षा दलील खारिज: कोर्ट ने बताया गंभीर अपराध
अदालत में कानूनी दलीलें और हाईकोर्ट का रुख:
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पुलिसकर्मियों का तर्क: आरोपी पुलिसकर्मियों ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 का हवाला देते हुए दलील दी कि यह घटना सरकारी कार्य के संपादन के दौरान हुई थी, इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति अनिवार्य है।
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हाईकोर्ट की दो टूक: अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से बांधकर पीटना किसी भी सूरत में आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं हो सकता।
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स्पष्टीकरण को बताया बेतुका: पुलिस ने अपनी जनरल डायरी (GD) में चोटों का कारण गिरफ्तारी के दौरान गिरना दर्ज किया था, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह बेतुका और अस्वीकार्य करार दिया।
📋 आईपीसी 354 सहित कई गंभीर धाराएं बरकरार: ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर
विधिक स्थिति और आगे की कार्यवाही:
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गंभीर धाराओं में आरोपपत्र: मामले में पुलिसकर्मियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) सहित कई संगीन धाराओं में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया है।
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डिस्चार्ज याचिकाएं निरस्त: हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ऐसे अपराधों में धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी की ढाल नहीं दी जा सकती।
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मुकदमे का सामना करेंगे पुलिसकर्मी: हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक पुनरीक्षण अर्जियों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई विधिक त्रुटि नहीं है और आरोपी पुलिसकर्मियों को अदालत में ट्रायल का सामना करना होगा।
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