केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2029 तक देश के 21 बीजेपी-एनडीए (BJP-NDA) शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का बड़ा ऐलान किया है। इस घोषणा के साथ ही डेडलाइन भी तय कर दी गई है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या 21 राज्यों में इसे लागू करने का पूरा व्यावहारिक ब्लूप्रिंट तैयार है?
इनमें से कई राज्यों में अगले दो सालों के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं। कई राज्यों में बीजेपी की अपनी सरकार है, तो कई जगह सहयोगियों के दम पर सत्ता चल रही है। ऐसे में सवाल वाजिब है कि क्या 2029 सिर्फ एक राजनीतिक लक्ष्य है या इसे पूरा करने का कोई ठोस रोडमैप भी तैयार किया जा चुका है?
दरअसल, अगले साल सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार है और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है, जबकि बाकी पांच राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं।
उत्तराखंड में UCC पहले ही लागू हो चुका है और गुजरात विधानसभा में इसका बिल पास हो चुका है। हालांकि, असली चुनौती उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों को लेकर है। उत्तर प्रदेश में अभी UCC बिल पास नहीं हुआ है और कुछ ही महीनों बाद चुनाव हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव से पहले यूपी में UCC लागू होगा या बीजेपी को भरोसा है कि चुनाव के बाद भी उसकी सरकार बनेगी और नई सरकार इसे लागू करेगी? यदि सत्ता का समीकरण बदला तो 2029 का यह टारगेट कैसे पूरा होगा?
🏔️ मणिपुर में आदिवासी समुदाय और पूर्वोत्तर की राजनीतिक स्थिति: क्या आसान होगी राह?
मणिपुर की स्थिति भी बहुत सरल नहीं है, क्योंकि वहां बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी निवास करती है। हालांकि, उत्तराखंड के UCC मॉडल में आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
वैसे UCC लंबे समय से बीजेपी की प्रमुख वैचारिक प्रतिबद्धताओं में शामिल रहा है। उत्तराखंड में इसे लागू कर दिया गया है, गुजरात में विधेयक पारित हो चुका है और अन्य राज्यों में भी इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की योजना है। उत्तर प्रदेश सरकार इसके लिए तैयार दिख रही है, लेकिन राजनीतिक विरोध भी जारी है।
🗓️ 2029 की डेडलाइन का क्या है रोडमैप? 2028 के चुनाव और सहयोगियों की भूमिका
वर्ष 2028 में त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होंगे। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, पांच राज्यों में बीजेपी सत्ता में है और दो राज्यों में सहयोगी दल सरकार में हैं। यानी 2029 के UCC टारगेट को हासिल करने में सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि एनडीए के सहयोगी दलों की भूमिका भी बेहद निर्णायक होगी।
🤝 TDP, JDU और LJP का क्या है रुख? एनडीए के भीतर उहापोह और राय-मशविरा
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TDP का रुख: तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के लोकसभा नेता लावु कृष्ण देवरायलु ने UCC का सैद्धांतिक समर्थन करने की बात कही है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया है कि पार्टी के भीतर इस पर विस्तृत चर्चा होना बाकी है। यानी समर्थन तो है, लेकिन अंतिम रोडमैप तय नहीं है।
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JDU का रुख: एनडीए की प्रमुख सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) कभी भी UCC विधेयक के खुलकर समर्थन में नहीं रही है। पार्टी के कुछ नेता बिहार में इसे लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। JDU नेता श्याम रजक का कहना है कि इसे बिहार में लागू नहीं होने दिया जाएगा, जबकि पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का मानना है कि इस विषय पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए और वे गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की बात भी कह चुके हैं।
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LJP (रामविलास) का रुख: चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) का रुख भी काफी महत्वपूर्ण है। चिराग पासवान ने साफ किया है कि उनकी पार्टी देश की एकरूपता के साथ-साथ उसकी विविधता के संरक्षण के लिए भी प्रतिबद्ध है। उनका कहना है कि UCC का औपचारिक ड्राफ्ट सामने आने के बाद उस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए और सभी हितधारकों (Stakeholders) की राय ली जानी चाहिए।
📢 एनडीए में समर्थक और विपक्ष का तीखा हमला: ओवैसी और उद्धव गुट का विरोध
एनडीए के भीतर UCC के मुखर समर्थक भी मौजूद हैं। शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने इसे सामाजिक समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी बताया है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने भी अमित शाह के इस ऐलान का स्वागत किया है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल इसके पुरजोर विरोध में खड़े हैं। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने UCC का विरोध करते हुए कहा कि यह भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान और अलग-अलग समुदायों की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ है। वहीं, उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना ने कहा कि वे सिद्धांत रूप में इसके समर्थन में हैं, लेकिन यदि इस मुद्दे पर राजनीति की जाएगी तो उनका विरोध कायम रहेगा।
❓ NCPI की चुप्पी और आंध्र प्रदेश में UCC लागू करने की चुनौती
बीजेपी के स्थानीय नेता प्रक्रिया जल्द शुरू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन एनडीए की नई सहयोगी NCPI ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार का कहना है कि जब औपचारिक प्रस्ताव आएगा, तब चर्चा के बाद ही पार्टी कोई अंतिम फैसला लेगी।
इसी तरह, लोकसभा चुनाव के साथ-साथ आंध्र प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव संपन्न होंगे, जहां TDP की सरकार है और चंद्रबाबू नायडू मुख्यमंत्री हैं। टीडीपी ने राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन का संकेत दिया है, लेकिन राज्य में इसे लागू करने को लेकर पार्टी के भीतर आंतरिक चर्चा होना बाकी है। ऐसे में क्या बीजेपी अपने सहयोगियों को पूरी तरह सहमत कर पाएगी?
फिलहाल अमित शाह ने 2029 का लक्ष्य तय कर दिया है, लेकिन 21 राज्यों में इसे पूरी तरह लागू करने की राह में राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी चुनौतियां कम नहीं हैं।
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