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‘हत्या के इरादे से की गई घरेलू हिंसा बेहद गंभीर’, दिल्ली HC ने खारिज की याचिका; 6 महीने से केस खत्म करने का आदेश

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दिल्ली हाईकोर्ट ने आज मंगलवार को अहम फैसले में कहा कि मर्डर करने के इरादे से की गई घरेलू हिंसा के अपराधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और वैवाहिक संबंध ऐसे मामलों में अपराध को कम करने वाला कारक नहीं हो सकता है. साथ ही कोर्ट ने आरोपी को जमानत दिए जाने से जुड़ी याचिका खारिज कर दी. मृतका के भाई की ओर से की गई शिकायत पर केस दर्ज हुआ, जिसमें कहा गया था कि आरोपी पहले से आपराधिक गतिविधियों में शामिल था.

जमानत याचिका से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सवर्णा कांता शर्मा ने कहा, “घरेलू हिंसा के अपराधों को, जिनमें हत्या किए जाने का भी इरादा हो, गंभीरता से लिया जाना चाहिए. ऐसे मामलों में वैवाहिक संबंध को अपराध को कम करने वाला कारक नहीं, बल्कि गंभीर बनाने वाला माना जाएगा.” कोर्ट भारतीय दंड संहिता (IPC, 1860) की धारा 307 और 506 तथा आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 25, 27, 54 और 59 के तहत दर्ज एक मामले में जमानत की मांग करने वाली एक आरोपी द्वारा दायर याचिका पर विचार कर रहा था.

भाई ने बयान के आधार दर्ज हुआ केस

यह पूरा मामला एक भाई के बयान के आधार पर दर्ज किया गया था जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि उसकी बहन के उसके पति, जो इस केस में मुख्य आरोपी है, ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि शादी के बाद मृतका को पता चला कि उसका पति आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहा है और इस वजह से वह 2015 में जेल भी गया था.

कहा जा रहा है कि मृतका अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती थी और जेल से बाहर आने के बाद, आरोपी ने उसे अपने साथ रहने के लिए मजबूर किया और मना करने पर उसे जान से मारने की धमकी भी दी थी. एफआईआर के अनुसार, जब मृतका ड्यूटी पर थी, तब आरोपी ने उसे जबरन एक ऑटो में बिठाया, एक देसी पिस्तौल निकाली, उसके पेट में गोली मार दी और वहां से फरार हो गया.

घर जाने से मना किया तो भड़क गया पति

आरोपी पति को जमानत देने से इनकार करते हुए, जस्टिस शर्मा ने कहा कि आरोपी के वकील ने अपने तर्क में बताया कि आरोपी ने पीड़िता पर तब गोली चलाई जब वह उसके साथ ससुराल जाने से इनकार करने पर गुस्से में आ गया था, और आवेश में आकर उसने महिला को गोली मार दी थी.

हाईकोर्ट ने कहा कि वह पत्नी द्वारा ससुराल जाने से इनकार करने पर पति के क्रोधित होने की दलील स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि इस वजह से उस पितृसत्तात्मक अधिकार का पता चलता है जिसमें पुरुष स्वयं को हकदार समझता है. कोर्ट ने यह भी कहा, “पीड़िता या पत्नी द्वारा आरोपी के साथ जाने से इनकार करना अचानक उकसावे की श्रेणी में नहीं आता.

कोर्ट को 6 महीने में केस खत्म करने का निर्देश

आरोपी की याचिका पर हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक घर लौटने से इनकार करने के पत्नी के दावे का जवाब एक बहुत ही क्रूर हिंसा के रूप में दिया गया, जिसमें उस पर गोली चला दी गई, जिसके लिए उसे एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और 4 सर्जरी करानी पड़ी. कोर्ट ने यह भी कहा कि क्षणिक आवेश में क्रोध की दलील स्वीकार करना पितृसत्तात्मक अधिकार की अवधारणा को सही ठहराने के जैसा होगा.

कोर्ट ने दलील को खारिज करते हुए, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर केस खत्म करे, क्योंकि आरोपी करीब छह साल से न्यायिक हिरासत में है.

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