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क्या भारत की राजनीति पलट देगी जेन जी? 38 करोड़ युवा वोटरों को साधने में जुटीं पार्टियां, जानें चुनावी विश्लेषण

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नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विभिन्न छात्र संगठनों ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आगामी 5 सितंबर को एक बार फिर बड़े मार्च का आह्वान किया है।

जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद बिहार और झारखंड सहित कई राज्यों में ‘जेन जी’ (Gen Z) युवाओं ने आक्रामक तरीके से अपनी आवाज उठाई है। छात्रों के इस रुख पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की कड़ी नजर है। राजनीतिक गलियारों में अब यह बड़ा सवाल बन चुका है कि क्या जेन जी वास्तव में इतनी प्रभावशाली शक्ति बन चुकी है कि वह पारंपरिक चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकती है।

🎯 पेपर लीक और परंपरागत वोट बैंक से परे: ‘आउट ऑफ सिलेबस’ ताकत बनी युवा पीढ़ी

पारंपरिक राजनीति और नए समीकरण:

  • जाति-धर्म के बंधनों से इतर: जहां देश की राजनीति लंबे समय से जाति और धार्मिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, वहीं युवा पीढ़ी रोजगार, पारदर्शिता और पेपर लीक जैसे ठोस मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है।

  • राजनीतिक दलों में हलचल: युवाओं के सड़क पर उतरने के बाद लगभग सभी प्रमुख दल—सपा, बसपा, कांग्रेस और बीजेपी—इस नई पीढ़ी को साधने के प्रयासों में जुटे हैं। यहां तक कि संघ प्रमुख भी युवाओं से लगातार संवाद स्थापित कर रहे हैं।

  • नेतृत्व की मांग: पारंपरिक राजनीति में लंबे समय से अधेड़ उम्र के नेताओं का वर्चस्व रहा है, लेकिन 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं के एकजुट होने से राजनीतिक नेतृत्व पर जवाबदेही का नया दबाव बना है।

📊 क्या है जेन जी की जनसांख्यिकी? 2029 तक 38 करोड़ वोटरों की ताकत

जनसांख्यिकी और चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण:

  • आयु वर्ग: जेन जी मुख्य रूप से 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी है, जिसकी वर्तमान उम्र लगभग 14 से 29 वर्ष के बीच है।

  • विशाल आबादी: भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की कुल आबादी 37 से 41 करोड़ के बीच आंकी गई है, जो विश्व में सबसे बड़ा युवा समूह है।

  • 2029 का प्रभाव: अनुमानों के मुताबिक 2029 के आम चुनावों तक देश में जेन जी मतदाताओं की संख्या करीब 38 करोड़ हो सकती है, जो कुल मतदान का लगभग हर तीसरा या चौथा वोट होगा।

📜 इतिहास के पन्नों से: जब युवा आंदोलनों ने बदल दी देश की सत्ता

छात्र और युवा आंदोलनों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:

  • 1974 का नव निर्माण आंदोलन (गुजरात): हॉस्टल मेस की फीस और भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों के आंदोलन के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा था।

  • 1974-75 का जेपी आंदोलन (बिहार): छात्र आंदोलन से शुरू होकर यह देशव्यापी क्रांति बनी, जिसके परिणामस्वरूप 1977 में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन हुआ।

  • 1990 का मंडल आंदोलन: आरक्षण नीति के विरोध और समर्थन में हुए व्यापक छात्र आंदोलनों ने देश की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित किया।

  • अन्ना व निर्भया आंदोलन (2011-12): युवाओं की व्यापक भागीदारी ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कड़े आपराधिक कानूनों का मार्ग प्रशस्त किया।

  • FTII व हैदराबाद विश्वविद्यालय (2015-16): गजेंद्र चौहान की नियुक्ति और रोहित वेमुला प्रकरण के विरोध में छात्रों के प्रदर्शनों ने संस्थागत जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस छेड़ी।

🗳️ क्या कहते हैं चुनावी विशेषज्ञ? यशवंत देशमुख का विश्लेषण

सी वोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख के प्रमुख विचार:

  • मतदाताओं का बदलाव: प्रत्येक चुनाव चक्र में करीब 7 से 8 प्रतिशत नए मतदाता जुड़ते हैं और पुराने घटते हैं, जिसका कुल चुनावी प्रभाव लगभग 10 प्रतिशत तक होता है। 2029 तक जेन-जी का हिस्सा 25 से 30 प्रतिशत हो सकता है।

  • याद रखने की क्षमता: जेन जी केवल यह नहीं देखती कि सरकार ने क्या किया, बल्कि इस पर भी ध्यान देती है कि कौन से वादे पूरे नहीं किए गए।

  • स्वतंत्र मतदान का रुझान: परिवारों के भीतर एक ही दल को वोट देने की परंपरा कमजोर हो रही है। युवा अब परिवार के पारंपरिक राजनीतिक झुकाव से अलग हटकर व्यक्तिगत मुद्दों के आधार पर निर्णय ले रहे हैं।

  • राजनीतिक स्मृति: 15 वर्षों तक एक ही शासन व्यवस्था को देखने वाली युवा पीढ़ी के पास पूर्ववर्ती सरकारों की सीधी तुलना नहीं होती, जिससे उनकी वर्तमान शासन से अपेक्षाएं और अधिक तीखी होती हैं।

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