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मासूम योजिता का अंतिम संदेश: ‘पापा, अब घर ले चलो…’ जहरीली कफ सिरप से गई जान, 16 डायलिसिस के बाद भी न बची मासूम

दो साल की योजिता ठाकरे को बस हल्का-सा बुखार था. पिता सुशांत उसे डॉक्टर के पास लेकर गए. डॉक्टर ने दूसरी दवाइयों के साथ सिरप भी लिखी. सबको लगा बेटी जल्दी ठीक हो जाएगी. लेकिन वही सिरप उसकी जिंदगी का आखिरी स्वाद बन गया. महज एक दिन में बुखार ठीक करने की दवा जहर बन गई और पिता की गोद में खिलखिलाने वाली बेटी 22 दिन तक मौत से लड़ती रही. 16 बार डायलिसिस हुआ इसके बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका.

वह दिन जब आया बुखार 

8 सितंबर की शाम. छिंदवाड़ा के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने वाले सुशांत ठाकरे अपनी बेटी योजिता को गोद में लिए डॉक्टर के पास पहुंचे. डॉक्टर ठाकुर, जिनसे वे हमेशा इलाज करवाते थे, उस दिन क्लिनिक में नहीं थे. सुशांत ने पास ही के डॉक्टर प्रवीण सोनी से संपर्क किया. डॉ. सोनी ने कुछ दवाइयां दीं और चार बार देने की सलाह देकर कहा, कोई दिक्कत नहीं, कल तक ठीक हो जाएगी. सुशांत ने बेटी को पहला डोज उसी के सामने पिलाया. रात में तीन बजे दूसरा, सुबह तीसरा और दोपहर में चौथा. लेकिन उस दिन के बाद जो हुआ, उसने पूरा परिवार तोड़ दिया.

हरे रंग की उल्टियां और टूटती उम्मीदें

अगली सुबह बुखार तो उतरा, पर योजिता की हालत बिगड़ गई. उसने हरे रंग की उल्टियां कीं. सुशांत फिर भागे डॉक्टर प्रवीण सोनी के पास. डॉक्टर ने जांच के बाद कहा, किडनी में इंफेक्शन है, तुरंत नागपुर ले जाइए. छिंदवाड़ा में इसका इलाज संभव नहीं. पिता सुशांत ने एक पल भी नहीं गंवाया. बेटी को गोद में उठाया और रातों-रात नागपुर के लिए निकल पड़े.

एक अस्पताल से दूसरे तक, लेकिन राहत नहीं मिली

नागपुर पहुंचने पर जिस अस्पताल का नाम डॉक्टर ने बताया था, वहां डायलिसिस की सुविधा ही नहीं थी. मजबूरन योजिता को उसी रात नेल्सन हॉस्पिटल ले जाया गया. वहीं उसकी जिंदगी की सबसे लंबी लड़ाई शुरू हुई 22 दिन तक लगातार इलाज, 16 बार डायलिसिस, वेंटिलेटर और अनगिनत इंजेक्शन. हर डायलिसिस के साथ सुशांत की उम्मीदें घटती जा रही थीं. पर बेटी की आंखों में वो चमक अब भी थी  ‘पापा, घर चलो…’ वो जानती भी नहीं थी कि अब उसका घर लौटना शायद नामुमकिन हो चुका है.

हर दिन बढ़ता बिल, घटती जिंदगी

नेल्सन हॉस्पिटल का बिल 12 लाख रुपए से ऊपर पहुंच गया. सुशांत एक साधारण शिक्षक हैं. महीने की सैलरी मुश्किल से परिवार चलाने लायक. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. भाई ने एफडी तोड़ दी, दोस्तों ने मदद की, ससुराल पक्ष ने जो था वो दिया. सोशल मीडिया के जरिए क्राउड फंडिंग की. मुंबई के एक एनजीओ ने एक लाख रुपये भेजे. स्कूल के साथी टीचरों और पड़ोसियों ने भी हाथ बढ़ाया.

22 दिन का संघर्ष, और फिर सन्नाटा

22 दिन तक मशीनों से बंधी योजिता लड़ती रही. पिता की आंखें हर रोज उसके होंठों से एक मुस्कान की उम्मीद करतीं. लेकिन 4 अक्टूबर को सुबह वह मुस्कान हमेशा के लिए खो गई. छिंदवाड़ा के उस छोटे से घर में अब खिलखिलाहट की जगह सन्नाटा है. दीवारों पर टंगी उसकी तस्वीरें और जन्मदिन का गुब्बारा अब भी वहीं हैं बस वो नहीं है.

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