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बिहार की ‘स्वर कोकिला’ ने राजनीति को क्यों नकारा? शारदा सिन्हा की लोकप्रियता का राजनीतिक दलों ने क्यों नहीं लिया फायदा

नई पीढ़ी की चर्चित लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने राजनीतिक पारी शुरू कर दी है. यह उनका निजी फैसला है. मैथिली के विधानसभा चुनाव लड़ने की भी संभावना है. करीब पच्चीस साल की यह गायिका पिछले करीब एक दशक में सुर्खियों में आईं; मधुर आवाज, सुरीली तान, मासूम और मोहक शैली से सोशल मीडिया की सुपरस्टार बन गईं. मैथिली के फॉलोअर्स बिहार की सीमा के बाहर देश और विदेश तक है. अब ऐन बिहार चुनाव के वक्त उसे राजनीति में जाने की इच्छा जागृत हुई तो लोक गायकी की विरासत और सियासत के संबंधों के कई नजीर बरबस याद आने लगे. सबसे हाल की लोकप्रिय उदाहरण बिहार कोकिला के नाम से मशहूर गायिका शारदा सिन्हा हैं, जिनकी शख्सियत और सत्ता की राजनीति के संबंध में उनके अपने विचार रहे हैं. उन्होंने राजनीति से खुद को हमेशा दूर ही रखा था.

दरअसल कला, संस्कृति और साहित्य जगत की हस्तियों के लिए बिहार विधानपरिषद की परिकल्पना की गई थी ताकि ये दिग्गज अपने-अपने कार्यक्षेत्रों की उपलब्धियों के विस्तार और संरक्षण के प्रस्ताव सरकार के सामने रख सकें. लेकिन अब चुनाव लड़कर इन जैसे लोगों को विधानसभा या लोकसभा पहुंचाने की परिपाटी शुरू हुई है. बिहार में ही शारदा सिन्हा की तरह कई और भी प्रसिद्ध लोक कलाकार हुए जिन्होंने राजनीति पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया. भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता था, उन्होंने अपनी रचनाओं में हमेशा राजनीति और सामाजिक असमानता पर कटाक्ष किए हैं. पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी भी बिहार की एक प्रसिद्ध लोक गायिका थीं. इन जैसे कई और कलाकारों ने कला के आगे सियासत को प्राथमिकता नहीं दी.

चाहतीं तो राजनीति में जा सकती थीं शारदा सिन्हा

गौरतलब है कि शारदा सिन्हा को चुनाव आयोग की तरफ से ब्रांड एम्बेसडर भी बनाया गया था. उन्होंने मतदाताओं को जागरूक करने का भी काम किया था. सत्ता और राजनीति के दिग्गजों से उनके करीबी संबंध भी रहे हैं. पहले उन्हें पद्म भूषण मिला फिर मरणोपरांत पद्मविभूषण सम्मान दिया गया था. जिस छठ के गीतों के लिए वह घर-घर में प्रसिद्ध रहीं, उसी छठ पर्व के दौरान पिछले साल उनका निधन हो गया था. लोकप्रिय राजनीतिक शख्सियत के तौर पर शारदा सिन्हा भी मैथिली की तरह ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसक रही हैं. उन्होंने भोजपुरी गीतों में भी एक प्रकार से स्वच्छता अभियान चलाने की ठानी थीं. वो जब चाहतीं राजनीति में जा सकती थीं, उनकी खासी लोकप्रियता थी, बड़े आराम से चुनाव जीत सकती थीं लेकिन कला साधना में सत्ता की राजनीति से हमेशा दूर ही रहीं.

सत्ता और राजनीति को लेकर शारदा सिन्हा के दो टूक विचार थे. उनका कहना था कि आजकल की राजनीति पहले जैसी नहीं रही. चुनावी माहौल भी पहले जैसा नहीं रहा. भाषा की मर्यादा नहीं रहती. अगर मैं राजनीति में जाऊं तो कला और संगीत की साधना में व्यवधान ही डालूंगी. किसी का राजनीतिक विचार अलग मसला है. हम किसी हस्ती के प्रशंसक हो सकते हैं. हम किसी भी पार्टी के समर्थक हो सकते हैं. हर कलाकार किसी ना किसी का मतदाता होता है लेकिन सीधी राजनीति में जाने का मतलब है अपने प्रशंसकों को बांटना. राजनीति को कला कभी रास नहीं आ सकती और ना ही सत्ता कला की मंज़िल होती है. राजनीति हमारी रुचि का क्षेत्र नहीं.

शारदा सिन्हा ने करीब पांच दशक तक लोकसंगीत की श्रद्धा से सेवा की. बातचीत में बता चुकी थीं कि कई बार उन्हें अनेक तरह के प्रलोभन दिए गए. ये प्रलोभन व्यावसायिक से लेकर राजनीतिक तक के रहे हैं लेकिन कभी इनके आगे नहीं झुकीं. ना तो व्यावसायिक लाभ लेकर लोक गायकी की गरिमा पर दाग लगाया और ना ही राजनीति का ऑफर स्वीकार कर कला की धारा को अवरुद्ध करना चाहा.

शारदा सिन्हा और मैथिली ठाकुर को समझें

शारदा सिन्हा और मैथिली ठाकुर में यहां कोई तुलना नहीं कर रहा हूं. कुछ बातें दोनों में समान हैं तो कुछ बड़े अंतर भी. शारदा सिन्हा भी बचपन से ही गा रही थीं. घर-आंगन में गाए जाने वाले विवाह गीतों और भजन को शास्त्रीय सुर ताल में ढालकर उसे अमरता प्रदान की. मैथिली ठाकुर भी कम उम्र से गा रही हैं और मैथिली भाषा में गाए गीतों को देशकाल की सीमा से बाहर निकाला है. मैथिली का यह अहम योगदान है. हालांकि शारदा सिन्हा ने अपने समय में जिस तरह से नए-नए लोकगीतों को खोजने और उसे संरक्षित करने में उद्यमशीलता दिखाई थी, आधुनिक लोकसंगीत में उसके नजीर बहुत कम नज़र आते हैं.

दोनों कलाकारों में एक समानता यह भी है कि उनका ताल्लुक मिथिलांचल से है. शारदा सिन्हा सुपौल से थीं तो मैथिली ठाकुर मधुबनी से हैं. दोनों जिले आस-पास हैं. सांस्कृतिक और भोगोलिक दूरी नहीं है लेकिन चुनाव और राजनीति को लेकर दोनों की सोच बिल्कुल अलग-अलग जाहिर हो गई. गोयाकि मैथिली को अब तक शारदा सिन्हा की उत्तराधिकार गायिका के तौर पर देखा गया है, जिन्होंने लोक गायकी में सुर, शब्द, संवेदना और शुचिता का पूरा ख्याल रखा है. मैथिली की लोकप्रियता उसकी क्लासिकी से है, जिसे उन्होंने लगातार मेंटेन करके रखा. लेकिन राजनीति में जाने का फैसला करके अब उन्होंने अपने प्रशंसकों के बीच विभाजक रेखा खुद ही खींच है.

क्या मैथिली ठाकुर ने सही फैसला किया?

राजनीति में कोई भी आ सकता है और चुनाव लड़ सकता है, यह उसका मौलिक अधिकार है उस लिहाज से मैथिली ठाकुर का फैसला उसका निजी मामला है. मैथिली ने गायन के साथ-साथ अब राजनीति के नाम पर समाज सेवा करने का भी इरादा जताया है. यह उसकी क्षमता पर निर्भर करता है कि वह कला और सियासत के बीच कैसे और कितना तालमेल बिठाकर रख पाती हैं. लेकिन उत्तर भारतीय राजनीति में कला और सिनेमा के दिग्गजों की क्या स्थिति रही है, वे कितने निर्णायक रहे हैं, उसके नजीर भी मौजूद हैं.

बीजेपी सांसद मनोज तिवारी भी राजनीति में जाने से पहले तक भोजपुरी के सुपरस्टार कहलाते थे. लेकिन राजनीति में जाने के बाद भोजपुरी की कला साधना के लिए कितना समय निकाल पाते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. सिनेमा जगत की हस्तियों में कंगना रनौत, स्मृति ईरानी, रवि किशन और निरहुआ आदि को भी देखें. अब मैथिली ठाकुर राजनीति में कौन-सी मंजिल हासिल करती हैं- इसका सभी को इंतजार रहेगा.

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