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‘बूढ़ी दिवाली’ क्यों है इतनी खास? जानें भगवान राम और परशुराम से जुड़ी अनोखी मान्यता

पूरे देश में दिवाली का उत्सव और उल्लास बीत चुका है, लेकिन देश का एक ऐसा राज्य है, जहां दिवाली के पर्व के एक माह बाद ‘बूढ़ी दिवाली’ मनाने की परंपरा है. इस राज्य का नाम है हिमाचल प्रदेश. ये प्रदेश अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां बूढ़ी दिवाली के रूप में दिवाली एक अनोखा रूप नजर आता है.

राज्य के सिरमौर जिले के शिलाई और कुल्लू जिले के निरमंड क्षेत्र में दिवाली के एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली होती है. इस साल बूढ़ी दिवाली का त्योहार 20 नवंबर से शुरू होगा और तीन से चार दिन मनाया जाएगा, लेकिन हिमाचल प्रदेश में बूढ़ी दिवाली क्यों मनाई जाती है? आइए इसका कारण जानते हैं.

क्यों मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली?

सिरमौर के शिलाई में ये मान्यता है कि जब लंकापति रावण का वध और 14 वर्षों का वनवास पूर्ण होने के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो सारे देश में ये खबर हो गई, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में भगवान राम के अयोध्या लौट आने की खबर देर से पहुंची. तभी यहां पर एक माह बाद दिवाली मनाई जाने लगी. इस शुभ मौके पर विवाहित बेटियों और रिश्तेदारों को घर बुलाया जाता है.

वहीं कुल्लू जिले के निरमंड क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली का संबंध भगवान परशुराम से जोड़ा जाता है. मान्यताओं के अनुसार, यहां भगवान परशुराम ने एक असुर का वध किया था. इसके बाद लोगों ने मशालें जलाकर जश्न मनाया था. यहां हर साल बूढ़ी दिवाली पर मशाल यात्रा निकाली जाती है. साथ ही रस्साकशी और पारंपरिक लोकगीत आयोजित किए जाते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार…

इसे वृत्तासुर राक्षस के वध की याद से भी जोड़ा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, देवराज इंद्र ने महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से वृत्तासुर का अंत किया था. देवराज इंद्र की विजय पर लोगों ने मार्गशीर्ष अमावस्या की रात मशालें जलाईं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया था.

बूढ़ी दिवाली के दिन पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं. लोकगीत गाए जाते हैं. बूढ़ी दिवाली पर स्थानीय लोग नाटी, रासा, विरह गीत भयूरी, परोकड़िया गीत, स्वांग और हुड़क नृत्य करते हैं. इस दौरान एक-दूसरे को मूड़ा, शाकुली, चिड़वा और अखरोट जैसे पारंपरिक व्यंजन बांटे जाते हैं और शुभकामनाएं दी जाती हैं.

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