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उत्तराखंड का अनोखा ट्रैक: 125 साल बाद बदली पहचान, 50 गांवों और हिमालयी खूबसूरती को समेटे है यह 200 किमी का रास्ता

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित ऐतिहासिक लॉर्ड कर्जन रोड अब एक नए नाम और नई पहचान के साथ सामने आया है. साल 1899 में ब्रिटिश भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन के निर्देश पर बनाया गया यह पैदल मार्ग करीब 125 साल पुराना है, जिसकी लंबाई लगभग 200 किलोमीटर बताई जाती है. अब इस ऐतिहासिक सड़क को नंदा सुनंदा परिपथ के नाम से जाना जाएगा.

ब्रिटिश शासनकाल में इस मार्ग का निर्माण गढ़वाल क्षेत्र के दुर्गम और दूरस्थ पहाड़ी इलाकों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से किया गया था, और आज भी यह बदरीनाथ, जोशीमठ, ग्वालदम और तपोवन जैसे अहम क्षेत्रों को जोड़ते हुए क्षेत्र की जीवनरेखा बना हुआ है. यह ट्रैक कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों को आपस में जोड़ता है और अपने मार्ग में 50 से ज्यादा गांवों से होकर गुजरता है, जहां से हिमालय की आठ प्रमुख चोटियां नजर आती हैं.

ग्वालदम से शुरू होकर तपोवन तक

यह मार्ग न सिर्फ जियोग्राफिकली से अहम है, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी इसकी खास पहचान है. क्योंकि इसे नंदा देवी राजजात यात्रा का पारंपरिक रास्ता माना जाता है. थराली ब्लॉक के ग्वालदम से शुरू होकर जोशीमठ ब्लॉक के तपोवन तक फैला, यह ट्रैक अपनी भौगोलिक विविधता (Geographic diversity), नेचुरल ब्यूटी और कल्चर के लिए जाना जाता है.

विदेशों से भी पहुंचते हैं पर्यटक

सालभर यह मार्ग ट्रैकिंग और पर्यटन के लिए अच्छा माना जाता है. हर साल यहां देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों से भी पर्यटक पहुंचते हैं और हिमालय की गोद में बसे इस ऐतिहासिक ट्रैक का अनुभव लेते हैं. समय के साथ यह मार्ग सिर्फ एक पैदल रास्ता नहीं रह गया है, बल्कि ऐतिहासिक विरासत और साहसिक पर्यटन का अनूठा संगम बन चुका है.

इसका नाम बदलकर नंदा सुनंदा परिपथ किए जाने से इसे धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में नई पहचान मिलने की उम्मीद है, जिससे ट्रैक से जुड़े गांवों में होमस्टे, स्थानीय गाइड, पोर्टर सेवाओं और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा. यह मार्ग हिमालय की जैव विविधता, संस्कृति और इतिहास को करीब से समझने का अवसर देता है और इसी कारण इसे एक रास्ते से बढ़कर हिमालय की जीवंत पाठशाला के रूप में देखा जाता है.

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