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छोटी काशी में सजा साहित्य का महाकुंभ: देश भर से जुटे दिग्गज साहित्यकार, हिंदी को वैश्विक मंच दिलाने पर दिया जोर

मंदसौर: छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध सीतामऊ में आयोजित साहित्य महोत्सव में देश की कई नामी हस्तियों ने शिरकत की. देश के कोने-कोने से आए साहित्यकारों और कला प्रेमियों ने हिंदी भाषा पर जोर देते हुए नई पीढ़ी से भारत की मौलिक संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा देने की अपील की है. इस आयोजन में साहित्य और पर्यावरण से जुड़ी हस्तियों के अलावा बॉलीवुड के कलाकारों ने भी हिस्सा लिया.

नटनागर शोध संस्थान में मौजूद हैं 30 हजार पांडुलिपियां

सीतामऊ स्थित नटनागर शोध संस्थान में आयोजित साहित्य महोत्सव का शनिवार देर रात समापन हो गया. इस आयोजन में पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी, पर्यावरण विद रजा काजमी, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता जेरी पिंटो के अलावा फिल्म फेयर अवार्ड विजेता प्रशांत पांडे ने भी हिस्सा लिया. नई पीढ़ी में हिंदी के प्रति कम होते रुझानों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने देश की सबसे बड़ी पांडुलिपियों की लाइब्रेरी और किताबों के संग्रह वाले संस्थान नटनागर शोध संस्थान में यह आयोजन किया.

इस संस्थान में पुरातन काल से विकसित हुई देश और दुनिया की अब तक की करीब 30 हजार पांडुलिपियां मौजूद हैं. वहीं, संस्थान में साहित्य जगत से जुड़ी हजारों किताबों का संग्रह भी मौजूद है. इसलिए देश के कोने-कोने से साहित्य जगत के छात्र, पीएचडी करने भी यहां पहुंचते हैं.

छात्रों को हिंदी साहित्य से जुड़ने की अपील

इस आयोजन में शिरकत करने आए पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि “साहित्य और कविता की रचना वही कर सकता है, जिसमें संवेदना को स्वयं महसूस करने की इच्छा शक्ति हो. संवेदना से ही रचना जन्म लेती है और रचना को शब्दों में ढालकर साहित्य का रूप दिया जाता है.” उन्होंने कहा कि “हिंदी भाषा हमारी मौलिक भाषा है और हजारों सालों से इस भाषा का हमारा अपना इतिहास है, जो अब देश और दुनिया में नई अलख जगा रही है.” उन्होंने छात्रों से हिंदी और साहित्य से जुड़ने की भी अपील की.

हिंदी में लिखे गीतों से मिलती है आत्मिक शांति

इस आयोजन में शिरकत करने आए साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता जेरी पिंटो ने कहा कि “हिंदी भाषा को भी समझना बहुत जरूरी है.” उन्होंने छात्रों से अंग्रेजी के अलावा हिंदी से भी जुड़े रहने की बात कही. वहीं, फिल्म फेयर अवार्ड विजेता प्रशांत पांडे ने अपनी मौलिक संस्कृति पर जोर देते हुए कहा कि “हिंदी भाषा में लिखे गए गीत मन को प्रसन्न कर देने वाले संगीत का आधार होते हैं. इन गीतों से आत्मिक शांति मिलती है. मन की शांति के लिए शब्दकोश का ज्ञान और साहित्य से जुड़ी रचनाओं को संगीत में ढालना ही गीतकार की एक कला है.”

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