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UCC पर सुप्रीम कोर्ट का ‘सुप्रीम’ फैसला! केंद्र को बड़ी टिप्पणी—”अब समय आ गया है, देश में लागू हो समान नागरिक संहिता”; बदल जाएगा कानून

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सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत की. कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब समान नागरिक संहिता लागू करने का वक्त आ गया है. जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित करके एक शून्य स्थिति उत्पन्न करने से बेहतर यही होगा कि इसे विधायी विवेक पर छोड़ दिया जाए ताकि विधायिका समान नागरिक संहिता पर कानून बना सके.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने विधायिका से पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली मुश्किलों से बचने के लिए इस पर काम करने का सुझाव दिया.

सभी महिलाओं के समान अधिकार के लिए UCC जरूरी

मुस्लिम महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकारों की मांग करने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि देश में सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना है. कोर्ट ने पहले ही समान नागरिक संहिता की सिफारिश की है. देखिए, एक मुस्लिम पुरुष… वह किसी भी प्रक्रिया का पालन करते हुए एकतरफा तलाक दे सकता है.

कोर्ट ने आगे कहा, “क्या हम पर्सनल लॉ पर आधारित सभी द्विविवाह संबंधों को अमान्य घोषित कर सकते हैं या नहीं. इसलिए हमें मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने के लिए विधायी शक्ति पर निर्भर रहना होगा.” CJI सूर्यकांत ने कहा कि जैसा कि सही कहा गया है, इसका उत्तर समान नागरिक संहिता है.

आप याचिका में संशोधन क्यों नहीं करतेः SC

मुस्लिम महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकारों की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका पूरे भारत में समान नागरिक संहिता लागू करना है.

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार के अधिकार नहीं दिए जाने के मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 को चुनौती देने वाली याचिका में संशोधन करने को भी कहा. मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण से कहा कि आप याचिका में संशोधन क्यों नहीं करते और वैकल्पिक प्रावधानों पर भी विचार क्यों नहीं करते? भारतीय महिलाओं के अधिकारों के एक अहम हिस्से से उन्हें वंचित किया जा रहा है, यह सवाल सिर्फ 1937 के अधिनियम का नहीं है.

इस पर वकील भूषण ने कहा, “मैं ऐसा करूंगा, हम याचिका में संशोधन भी करेंगे.” ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले को स्थगित कर दिया जाए, इस बीच याचिकाकर्ता को संशोधित याचिका दाखिल करने की अनुमति दी जाती है.

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