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राम मंदिर चढ़ावा चोरी के बाद अब ‘लैंड डील’ पर सवाल, SIT के पास पहुंचे दस्तावेजों के नए सबूत

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राम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड के साथ ही अब राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई जमीनों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने कई ऐसी जमीनों को ट्रस्ट में शामिल कर लिया, जो विवादित थीं। अयोध्या के संतों, वकीलों और कारसेवकों के साथ-साथ अब सरकारी कागजात भी इन लैंड डील्स की ओर इशारा कर रहे हैं। TV9 भारतवर्ष के पास ट्रस्ट की दो नई लैंड डील्स से जुड़े सबूत और गवाह मौजूद हैं, जिन पर अब कानूनी सवाल उठ रहे हैं।

🚫 नजूल की जमीन का बैनामा और कानून

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ‘नजूल’ की जमीन का बैनामा (Registry) हो सकता है? कानून के जानकारों का कहना है कि जो जमीन रिकॉर्ड में सरकार की है, उसे ट्रस्ट के नाम करना कानूनी रूप से गलत है। आरोप है कि ट्रस्ट के चंपत राय के कार्यकाल में रसूख का इस्तेमाल कर नियमों को दरकिनार किया गया और चंदे की राशि का दुरुपयोग कर ऐसी संपत्तियों पर आधिपत्य जमाया गया।

📜 गैरकानूनी लैंड डील के पुख्ता आरोप

एडवोकेट राम अनुराग का कहना है कि सुग्रीव टीला के पास गाटा संख्या-247 की डील पूरी तरह से अवैध है। यह जमीन राम मंदिर के निकास द्वार के पास स्थित है और इसके दस्तावेजों पर महंत मुरली दास और चंपत राय के हस्ताक्षर हैं। यह डील 23 करोड़ रुपये से अधिक में तय हुई थी। महंत धर्म दास सहित कई संतों ने आरोप लगाया है कि केवल एक नहीं, बल्कि ऐसी कई जमीनें गलत तरीके से खरीदी गई हैं और इसमें करोड़ों रुपये की हेरा-फेरी हुई है।

🔍 SIT के पास पहुंचे सबूतों की फाइलें

कल देर शाम SIT की पूछताछ के बाद, धर्म सेना के अध्यक्ष संतोष दुबे ने सबूतों की फाइल के साथ CO अयोध्या के कार्यालय में दस्तक दी। उनके पास जो फाइलें हैं, उनमें नजूल की जमीन और मंदिर की ‘देवोत्तर संपत्ति’ से संबंधित दस्तावेज शामिल हैं। संतोष दुबे और हरिशंकर सफरीवाला ने कुल 8 प्रमुख सबूत SIT को सौंपे हैं, जिनमें वह जमीन भी शामिल है जहाँ वर्तमान में ट्रस्ट का कैंप कार्यालय बना हुआ है।

⚖️ क्या केवल चढ़ावा चोरी तक सीमित रहेगी जाँच?

अब सवाल यह है कि क्या SIT की अंतिम रिपोर्ट केवल चढ़ावा चोरी के मामले तक ही सीमित रहेगी, या इन विवादास्पद लैंड डील्स और चंदा मिसमैनेजमेंट (Chanda Mismanagement) की भी निष्पक्ष जांच होगी? प्रथम दृष्टया आरोपों के अनुसार, यह मामला केवल एक वित्तीय हेरा-फेरी नहीं, बल्कि आस्था के नाम पर जमा किए गए चंदे के बड़े दुरुपयोग का संकेत दे रहा है।

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