सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को बड़ी राहत देते हुए उनकी जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से भी मना कर दिया, जिसमें देवघर चारा घोटाला मामले में उनकी सजा पर रोक लगाई गई थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने इस मामले में झारखंड सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की।
🕒 HC से सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि मामले में सात साल का लंबा समय बीत चुका है, इसलिए अब इस पर और हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि वह लालू प्रसाद यादव से जुड़ी लंबित आपराधिक अपीलों पर अगले छह महीनों के भीतर अपना फैसला सुनाए। बेंच ने माना कि अब मामले की सुनवाई में तेजी लाना ही सबसे बेहतर समाधान है।
🏛️ कोर्ट में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एएसजी एसवी राजू ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने सजा की अवधि की गलत गणना के आधार पर लालू यादव को राहत दी थी। उन्होंने सीआरपीसी (CrPC) की धारा 427 का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग मामलों में सजाएं एक के बाद एक (Consecutively) चलनी चाहिए, न कि एक साथ (Concurrently)।
वहीं, लालू प्रसाद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने इन तर्कों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि सजा का स्वरूप (एक साथ या बाद में) तय करना अंतिम चरण का विषय है और वर्तमान में हाई कोर्ट का फैसला सही पैमाने पर आधारित है, जिसके तहत आधी सजा पूरी करने पर राहत दी गई थी।
📜 मामले की पृष्ठभूमि
सीबीआई की विशेष अदालत ने देवघर चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव को साढ़े तीन साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद लालू ने हाई कोर्ट में सजा निलंबन की अर्जी लगाई थी। उनकी पहली दो अर्जियां इस आधार पर खारिज कर दी गई थीं कि उन्होंने अभी अपनी आधी सजा पूरी नहीं की है। तीसरी अर्जी में यह तर्क दिया गया कि उन्होंने आधी से अधिक सजा पूरी कर ली है, जिसे हाई कोर्ट ने स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी जमानत को बरकरार रखा है।
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