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नाम बड़े और दर्शन छोटे: सिवनी के सांदीपनि विद्यालय में सरकारी दावों की खुली पोल

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जुलाई बीत गई, पर नहीं मिलीं किताबें और कापियाँ; प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ी शिक्षा व्यवस्था

ड्रेस मिलने तक बच्चों के लिए हो जाती है ‘छोटी’,

​राष्ट्र चंडिका न्यूज़ सिवनी। प्रदेश सरकार के गलियारों में शिक्षा के ‘कायाकल्प’ और स्कूलों के ‘गुणवत्तापूर्ण उन्नयन’ का खूब गुणगान किया जा रहा है। सरकारी विज्ञापनों और मंचों से शिक्षा व्यवस्था को सर्वोपरि बताने का दावा किया जा रहा है, लेकिन सिवनी के सांदीपनि विद्यालय की बदहाल स्थिति सरकार के इन दावों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। यहाँ की लचर व्यवस्था यह बताने के लिए काफी है कि सरकार की प्राथमिकता में छात्रों का भविष्य कहाँ है।

बीते वर्ष की भी ड्रेस का अता-पता नहीं

विद्यालय में शिक्षा विभाग के दावों का खोखलापन इस बात से साबित होता है कि छात्रों को अभी तक बीते वर्ष की ड्रेस भी उपलब्ध नहीं कराई गई है। जहाँ सरकार ‘निःशुल्क गणवेश वितरण’ जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ती, वहीं धरातल पर सांदीपनि विद्यालय के छात्र बीते वर्ष से ही ड्रेस के इंतज़ार में सरकारी सिस्टम की बेरुखी झेल रहे हैं।

शैक्षणिक सत्र शुरू, पर किताबों का अभाव

जुलाई का महीना बीतने को है, नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन विद्यालय में न तो किताबें पहुँची हैं और न ही कापियाँ। बिना संसाधनों के शिक्षा की डगर पर चलने को मजबूर इन बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या सरकार सिर्फ विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने के लिए है या छात्रों को बुनियादी सामग्री उपलब्ध कराने के लिए भी?

देरी की हद: वितरण होते ही ‘छोटी’ पड़ने लगती है ड्रेस

विभागीय लापरवाही और प्रशासनिक सुस्ती का सबसे क्रूर मजाक ड्रेस वितरण के नाम पर होता है। सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली इतनी धीमी है कि जब तक वितरण की प्रक्रिया पूरी होती है, तब तक काफी समय बीत चुका होता है। मजे की बात तो यह है कि जब छात्रों को ड्रेस मिलती है, तब तक वह उन्हें छोटी पड़ने लगती है। क्या सरकार को इस बात का अहसास नहीं है कि बच्चों का शारीरिक विकास निरंतर होता है? वितरण में देरी की यह जिद स्पष्ट करती है कि योजनाएं धरातल पर क्रियान्वित करने के लिए नहीं, बल्कि केवल कागजों पर आंकड़े जुटाने के लिए बनाई जाती हैं।

सरकारी दावों और हकीकत के बीच पिसता छात्र

सरकार के इन खोखले दावों के बीच अभिभावक बेहद आक्रोशित और हताश हैं। एक तरफ सरकार शिक्षा पर करोड़ों खर्च करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ छात्र बिना किताबों और सही माप की ड्रेस के स्कूल जाने को मजबूर हैं। यह व्यवस्था सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी कथनी-करनी के अंतर पर एक गहरा और गंभीर प्रश्न चिह्न लगाती है।

​क्या सरकार छात्रों के भविष्य को लेकर वाकई गंभीर है, या यह सब केवल एक दिखावा है? अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि इस सरकारी उदासीनता को तत्काल खत्म किया जाए और छात्रों को अविलंब संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।

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