Gwalior High Court News: पारिवारिक विवाद को बंदी प्रत्यक्षीकरण का मामला बनाना गलत, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बहू और उसके बेटे को कथित अवैध बंधन से मुक्त कराने की मांग वाली हैबियस कार्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने तथ्यों को छिपाते हुए यह याचिका दायर की है और पूरा मामला अवैध निरुद्धि का नहीं, बल्कि एक पारिवारिक विवाद का प्रतीत होता है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत मिलने वाली हैबियस कार्पस की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं किया जा सकता।
📝 विरोधाभासी बयानों और मानसिक दिव्यांगता पर कोर्ट के सवाल
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता पहले अपने बेटे नीरज को 75 प्रतिशत मानसिक दिव्यांग बता रहा था, लेकिन रिकॉर्ड में कई गंभीर विरोधाभास सामने आए। कोर्ट ने कड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि यदि बेटा वास्तव में मानसिक रूप से अस्वस्थ था, तो उसकी शादी क्यों कराई गई और वह पिता कैसे बना? इन विरोधाभासी और अस्पष्ट तथ्यों के आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
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