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छिंदवाड़ा: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पातालकोट में रात रुककर वादियों और संस्कृति की खूब तारीफ की. राज्यपाल ने भी पातालकोट के गांवों में घूमकर आदिवासियों के उत्थान के लिए सरकार की खूब तारीफ की. अधिकारी भी यहां पर पूरी देखरेख का दम भरते हैं. लेकिन हकीकत को बयां करती एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई है. जहां चिमटीपुर के सरकारी स्कूल का भवन नहीं होने से बच्चे कई सालों से एक छप्पर वाले घर में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.

पातालकोट की सुंदरता के बीच कलंक से कम नहीं यहां का स्कूल
पातालकोट मतलब प्राकृतिक सौंदर्य, गहरी घाटियां, घने जंगल और यहां की आदिवासी संस्कृति की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है. देश-विदेश से टूरिस्ट यहां की खूबसूरत वादियों को देखने पहुंचते हैं. सरकार और प्रशासन की ओर से भी पातालकोट के विकास के लिए लगातार योजनाएं संचालित की जा रही हैं. लेकिन इसी पातालकोट के ग्राम तालाबढाना में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है. तालाबढाना के एकीकृत शाला चिमटीपुर की प्राथमिक शाला आज भी स्कूल बिल्डिंग का इंतजार कर रही है. स्कूल के पास बच्चों को पढ़ाने के लिए अपना भवन तक नहीं है. ऐसे में बच्चों को कच्चे मकान और असुविधाजनक परिस्थितियों में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है. बारिश के मौसम में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है.

शिक्षक बदले लेकिन स्कूल की तस्वीर नहीं बदली
डोंगरा के ग्रामीण गोलू भारती ने बताया कि, “स्कूल भवन की समस्या आज की नहीं, बल्कि 5 सालों पुरानी है. पिछले कई दिनों से स्कूल में पढ़ने वाले शिक्षक बदल गए लेकिन स्कूल की स्थिति नहीं सुधरी. आज भी कच्चे मकान में संचालित हो रहे हैं. स्कूल शिक्षक आते रहे और अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे. लेकिन स्कूल भवन के निर्माण की समस्या जस की तस बनी हुई है.”

इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी जगदीश प्रसाद इढ़पाचे का कहना है कि, ”उस गांव के लिए शासन से स्कूल की स्वीकृति हो गई है. बारिश थमते ही स्कूल का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा.”

ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई के लिए अपना घर दिया
करीब 5 साल पहले जब स्कूल की बिल्डिंग बारिश के मौसम में गिर गई थी, तो वहां पर बच्चों के लिए पढ़ाई करना मुश्किल हो रहा था. गांव के ही भारिया जनजाति के गोल भारती ने अपना घर स्कूल संचालित करने के लिए दे दिया. गोल भारती ने बताया कि ”गांव में स्कूल बन जाए उसकी यही इच्छा है. वह ना तो किसी तरीके का प्रशासन से किराया लेता है और ना ही कोई मेंटेनेंस का उसे पैसा मिलता है. लेकिन गांव के बच्चों का भविष्य देखते हुए उन्होंने अपना घर स्कूल संचालित करने के लिए दिया है.

जंगल के बीच स्कूल तक पहुंचना भी मुश्किल
पातालकोट इलाके में 12 गांव आते हैं. पहाड़ी के ऊपर चिमटीपुर एक कस्बा है. वहीं से कुछ दूरी पर स्कूल संचालित किया जाता है. बरसात के मौसम में पढ़ाई के लिए पाठशाला तक पहुंचना भी बच्चों के लिए मुश्किल होता है. सड़के नहीं होने की वजह से बच्चे कच्चे पथरीले रास्तों से होकर गुजरते हैं. लेकिन अब तक प्रशासन का इस ओर ध्यान नहीं दे रहा.

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