Local & National News in Hindi

Dhamtari Maratha Community: मराठा पारा में जीवंत हुई सदियों पुरानी संस्कृति; महालक्ष्मी पूजा में उमड़ा आस्था का सैलाब

45

धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी शहर स्थित मराठा पारा में इन दिनों महालक्ष्मी यानी माता गौरी पूजन की जबरदस्त भक्तिमय रौनक देखने को मिल रही है। मराठा समाज की सदियों पुरानी ऐतिहासिक एवं धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा, नियम-संयम और अभूतपूर्व उत्साह के साथ निभाई जा रही है। समाज के अधिकांश घरों में मां महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है, जिससे पूरा अंचल भक्ति के माहौल में डूब गया है।

⏳ ढाई दिनों तक चलता है विशेष धार्मिक अनुष्ठान: भाद्रपद माह में होती है स्थापना और विसर्जन

मराठा समाज में यह पर्व महज एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध परंपरा, अटूट आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

भाद्रपद महीने में आयोजित होने वाली यह पूजा पूरे ढाई दिनों तक चलती है। भाद्रपद की सप्तमी तिथि के दिन मां महालक्ष्मी की स्थापना की जाती है, अष्टमी को महापूजन व विशेष महाआरती की जाती है और नवमी के दिन पूरे सम्मान के साथ पूजा संपन्न कर माता की प्रतिमा को वापस सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है।

📜 जानिए क्या है इस महापूजन की पौराणिक मान्यता?: भगवान कृष्ण और युधिष्ठिर की कथा से जुड़ा है इतिहास

मराठा समाज के प्रबुद्ध नागरिक विश्वजीत कृदत्त ने बताया कि इस पूजा का इतिहास मराठा समाज के साथ बहुत गहरा जुड़ा हुआ है।

पौराणिक व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने पांडव श्रेष्ठ युधिष्ठिर को उनके खोए हुए राज-पाट और ऐश्वर्य की पुनः प्राप्ति के लिए इस विशेष व्रत और महापूजन का महत्व बताया था। प्राचीन काल में यह पूजा 16 दिनों तक की जाती थी, लेकिन सामान्य गृहस्थ जीवन में 16 दिनों तक कड़े नियमों का पालन करना कठिन होने के कारण इसे ढाई दिनों में ही संपूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न करने की परंपरा शुरू हुई।

🥗 16 प्रकार की सब्जियां, 16 चटनियां और करोंजी का विशेष नैवेद्य: मां लक्ष्मी को लगता है विशेष भोग

इस महापूजन की सबसे अनूठी और मुख्य बात माता को अर्पित किया जाने वाला विशेष नैवेद्य (महाभोग) है।

महापूजा के दिन एक ही थाली में 16 प्रकार की ताजी सब्जियां, 16 तरह की स्वादिष्ट चटनियां और खास तरह की उबली हुई रोटियां माता को भोग स्वरूप अर्पित की जाती हैं। इसके अलावा घरों में पारंपरिक मिष्ठान और पकवान भी तैयार किए जाते हैं। मान्यता है कि माता को इस भव्य भोग को अर्पित करने से घर में स्थाई लक्ष्मी का वास होता है और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

इसके साथ ही, करोंजी और पापड़ी का विशेष ‘फुलौरा’ बनाकर घर में लटकाया जाता है। समाज की मान्यता है कि रात्रि काल में माता के लिए यह रखा जाता है और दूध में शहद मिलाकर भी मां को अर्पित किया जाता है। अगले दिन ताजी करोंजी का नैवेद्य लगाया जाता है।

🏰 वर्ष 1742 से लगातार जारी है यह पवित्र परंपरा: आधुनिकता के दौर में भी जीवंत हैं प्राचीन रीतियां

मराठा समाज के इतिहास के अनुसार धमतरी क्षेत्र में यह परंपरा करीब सन 1742 से अनवरत चली आ रही है, जबकि इस अंचल में मराठा समाज के आगमन का इतिहास 1739 से जुड़ा हुआ बताया जाता है।

गौर करने वाली बात यह है कि करीब तीन शताब्दियों के बाद भी इस पूजा के मूल स्वरूप और शुद्धता पर आधुनिकता का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। पूरे आयोजन के दौरान पवित्रता, शुद्धता और पारंपरिक रीति-रिवाजों का बेहद सख्ती से पालन किया जाता है।

मराठा समाज के लोग वर्ष भर इस पावन पर्व का इंतजार करते हैं। महापूजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं और कई घरों में विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। मराठा समाज में इस पर्व को कोई महालक्ष्मी तो कोई गौरी के नाम से पुकारता है। यही वजह है कि धमतरी का मराठा पारा इन दिनों धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी ऐतिहासिक संस्कृति को जीवंत रूप में समेटे हुए है।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.