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मध्य प्रदेश में ओबीसी और पदोन्नति में आरक्षण जैसे मुद्दे लोकसभा चुनाव से गायब, विधानसभा चुनाव में खूब हुई थी चर्चा

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भोपाल। विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, वे लोकसभा चुनाव में गायब हो गए। दोनों दलों द्वारा न तो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण मुद्दा उठाया जा रहा है और न ही पदोन्नति में आरक्षण की बात हो रही है। पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) बहाली की चर्चा भी नहीं हो रही है।

जबकि, पदोन्नति में आरक्षण और ओपीएस के मुद्दे पर कर्मचारियों ने कांग्रेस का समर्थन किया था। दरअसल, भाजपा का पूरा चुनाव अभियान मोदी गारंटी पर केंद्रित है तो कांग्रेस न्याय गारंटी को लेकर चल रही है। प्रदेश में अभी तक हुई बड़े नेताओं की सभाओं में भाजपा तुष्टीकरण, परिवारवाद, विरासत टैक्स और संपत्ति के सर्वे को लेकर कांग्रेस पर बरस रही है तो कांग्रेस गरीबी, बेरोजगारी और सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग को लेकर भाजपा पर हमला बोल रही है।

राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के अनुसार प्रदेश में 50 प्रतिशत यानी लगभग आधी जनसंख्या ओबीसी की है, पर ओबीसी आरक्षण जैसे विषय को छेड़कर दोनों बड़े दल विवाद में नहीं पड़ना चाहते। ऐसा नहीं है कि दोनों दलों के चुनाव प्रचार में ओबीसी वर्ग अछूता है। भाजपा और कांग्रेस खुद को ओबीसी वर्ग का हितैषी और एक-दूसरे को विरोधी बताने में पीछे नहीं रहती पर आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे से दूरी बनाकर चल रही हैं। हालांकि, दोनों ही दलों ने प्रत्याशी चयन में ओबीसी का ध्यान रखा।

इसी प्रकार 2018 के विधानसभा, 2019 के लोकसभा और पिछले विधानसभा चुनाव में चर्चा में रहा पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा भी गायब है। मई 2016 से पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट से रोक है। अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

बड़ी संख्या में अधिकारी-कर्मचारी बिना पदोन्नति रिटायर हो गए। इस चुनाव के पहले भाजपा-कांग्रेस दोनों एक दूसरे को इस मुद्दे पर घेरती रही हैं। कांग्रेस कहती रही है कि भाजपा सरकार सुप्रीम कोर्ट में ठीक से पैरवी नहीं कर रही है न ही पदोन्नति के लिए कोई रास्ता निकाल रही है।

पिछले चुनाव विधानसभा और लोकसभा चुनाव में छाया रहा ओबीसी आरक्षण का मुद्दा

2018 में विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने की बात कही थी। सत्ता में आने पर कांग्रेस सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया, पर एक याचिका पर हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी।

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाया पर लाभ नहीं मिला। पार्टी केवल एक छिंदवाड़ा सीट ही जीत सकी। उधर, मार्च 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के बाद भाजपा सरकार बनी तो उसने कोर्ट में ओबीसी आरक्षण को लेकर पैरवी की। इस पर कोर्ट ने तीन विभागों की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी लेकिन 27 प्रतिशत आरक्षण नहीं रोका। इसे आधार पर बनाकर सरकार ने सभी विभागों में इसे लागू कर दिया पर न्यायालय में आरक्षण का मुद्दा लंबित होने के कारण 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

13 प्रतिशत पदों को रोककर 14 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से भर्तियां की जा रही हैं। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस आधार पर जहां भाजपा को ओबीसी विरोधी बताकर घेरने की कोशिश की तो भाजपा ने कांग्रेस को ही इस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस जाति आधारित जनगणना की बात जरूर कह रही है, जिसमें उनकी संख्या के आधार पर ही लाभ देने की बात कही जा रही है।

पुरानी पेंशन योजना पर भी नहीं हो रही बात

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) फिर से लागू करने की बात कही थी। इसके माध्यम से पार्टी ने बड़े वर्ग वाले कर्मचारी मतदाताओं को साधने की कोशिश की थी। कुछ राज्यों में कांग्रेस सरकार ने इसे लागू भी किया था, पर लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा गायब है।

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