सिवनी में ड्रग्स का पर्दाफाश क्या सिर्फ छोटे मोहरे ही पकड़े जाते हैं ?
राष्ट्र चंडिका न्यूज, सिवनी पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई में अंतर्राज्यीय ड्रग गिरोह के दो सदस्यों को गिरफ्तार कर लगभग 70,000 की कीमत का एमडी पाउडर जब्त किया है। यह कार्रवाई जिले में बढ़ रहे नशे के कारोबार और उससे जुड़ी आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए की गई है, लेकिन इसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक बड़ी सफलता… या सिर्फ शुरुआत ? पुलिस को 15 अगस्त को मिली गुप्त सूचना के आधार पर, एक विशेष टीम ने नाकाबंदी कर हर्षद उर्फ शनि डहरवाल को गिरफ्तार किया, जिसके पास से 7 ग्राम एमडी पाउडर और अन्य सामान बरामद बरामद हुए। हर्षद से पूछताछ के बाद, पुलिस ने नागपुर से इस गिरोह के सरगना आसिफ शेख पठान को भी दबोच लिया, जिसके खिलाफ पहले से ही कई गंभीर मामले दर्ज हैं। इस कार्रवाई को पुलिस की एक बड़ी कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। थाना प्रभारी किशोर वामनकर और उनकी टीम ने जिस तरह से सूचना पर तुरंत कार्रवाई की, वह सराहनीय है। यह दर्शाता है कि पुलिस नशे के इस जाल को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। बड़ा सवाल- आखिर बड़े तस्करों तक क्यों नहीं पहुंच पा रही है पुलिस ? यह कार्रवाई भले ही एक बड़ीसफलता हो, लेकिन इससे एक गंभीर सवाल भी खड़ा होता है क्या पुलिस सिर्फ छोटे तस्करों को ही पकड़ पा रही है? स्थानीय युवाओं तक यह नशा पहुंचाने वाले बड़े आका या सरगना आखिर क्यों पकड़ से बाहर हैं? अक्सर यह देखा जाता है कि छोटे स्तर के तस्करों की गिरफ्तारी के बाद भी नशे का कारोबार जारी रहता है, क्योंकि इस गिरोह के मुखिया या तो राजनीतिक संरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, या उनके पास मजबूत नेटवर्क है जिसके चलते पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाती। इस मामले में भी आगे की जांच जारी है, और यह देखना बाकी है कि क्या पुलिस इस ड्रग चेन को तोड़ने और असली आकाओं तक पहुंचने में सफल हो पाएगी। हालांकि, यह कार्रवाई एक व्यापक सामाजिक समस्या की ओर इशारा करती है। सिवनी जैसे छोटे शहरों में युवाओं के बीच नशे की लत तेजी से बढ़ रही है। सस्ते और आसानी से उपलब्ध होने वाले नशीले पदार्थ युवाओं को अपराध की दुनिया में धकेल रहे हैं। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस इस ड्रग चेन को जड़ से उखाड़ पाएगी ? अक्सर यह देखा जाता है कि छोटे स्तर के तस्कर तो पकड़े जाते हैं, लेकिन उनके पीछे के आका या बड़े खिलाड़ी पुलिस की पहुंच से बाहर रहते हैं। आम जनता में यह धारणा है कि इन बड़े तस्करों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे पुलिस उन पर हाथ डालने से कतराती है। जब तक इन आकाओं पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसी गिरफ्तारियां सिर्फ सतह को ही छू पाएंगी, और नशे का कारोबार बेरोकटोक जारी रहेगा। इस गिरफ्तारी के बाद, अब प्रशासन और समाज दोनों के सामने यह चुनौती है कि वे मिलकर इस समस्या का समाधान कैसे निकालते हैं। पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे बड़े तस्करों को भी कानून के कटघरे में लाएँ, और समाज को अपने युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे।