धान खरीदी केंद्रों पर अधिकारियों से ज्यादा ‘तथाकथित’ पत्रकारों का पहरा,500 की वसूली के खेल में पत्रकारिता शर्मसार
राष्ट्र चंडिका न्यूज़.सिवनी: जिले में इन दिनों धान खरीदी का सीजन अपने चरम पर है, लेकिन केंद्रों पर सरकारी निगरानी से ’यादा ‘फर्जी पत्रकारिता’ का बोलबाला नजर आ रहा है। आलम यह है कि जहां जिम्मेदार अधिकारियों के निरीक्षण इक्का-दुक्का ही होते हैं, वहीं ‘तथाकथित’ पत्रकारों के झुंड रोजाना अलग-अलग केंद्रों पर अपनी धमक दे रहे हैं। विडंबना यह है कि इन दौरों का मकसद व्यवस्था सुधारना नहीं, बल्कि जेब गर्म करना है।
निरीक्षण बनाम वसूली: एक कड़वा सच-जिले के विभिन्न धान खरीदी केंद्रों से मिल रही शिकायतों के अनुसार, रोजाना 3-4 लोगों का झुंड खुद को पत्रकार बताकर केंद्रों पर धमकता है। ये लोग व्यवस्थाओं में कमियां निकालने के नाम पर केंद्र प्रभारियों को डराते-धमकाते हैं।
हैरानी की बात यह है कि- अधिकारियों का निरीक्षण: जब कोई प्रशासनिक अधिकारी केंद्र पर पहुंचता है, तो अगले दिन समाचार पत्रों में उसकी रिपोर्ट आती है और कमियों को सुधारने के निर्देश दिए जाते हैं।
तथाकथितों का ‘निरीक्षण’: ये स्वयंभू पत्रकार केंद्र पर पहुंचते हैं, हंगामा करते हैं और फिर 500 से 1000 रुपये की ‘सुविधा शुल्क’ लेकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। इनके जाने के बाद न कोई खबर आती है और न ही व्यवस्था में कोई सुधार होता है।
असली पत्रकारों की साख पर बड़ा खतरा
इस ‘वसूली गैंग’ के चलते सिवनी जिले के उन पत्रकारों की छवि बुरी तरह धूमिल हो रही है जो वर्षों से ईमानदारी और निष्ठा के साथ जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं। केंद्र प्रभारी और कर्मचारी अब हर पत्रकार को उसी ‘उगाही वाले चश्मे’ से देखने लगे हैं। वास्तविक पत्रकारों का कहना है कि इन फर्जी पत्रकारों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ‘धंधा’ बना लिया है, जिससे समाज में पत्रकारों के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।
झुंड में शिकार, और फिर गायब
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, ये तथाकथित पत्रकार अकेले आने की हिम्मत नहीं करते, बल्कि 4-5 की टोली बनाकर पहुंचते हैं ताकि दबाव बनाया जा सके। केंद्र प्रभारियों की भी मजबूरी यह है कि वे विवाद से बचने के लिए इन ‘मौरूसी पत्रकारों’ को पैसे देकर विदा करना ही बेहतर समझते हैं।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल?
खरीदी केंद्रों पर इस तरह की अवैध गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद जिला प्रशासन और पुलिस विभाग मौन है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन फर्जी आईडी कार्ड धारियों पर नकेल कसेगा? क्या सूचना विभाग (क्कक्रह्र) ऐसे लोगों की पहचान कर उन पर कार्रवाई सुनिश्चित करेगा?
क्षेत्रीय पत्रकारों की मांग: ‘प्रशासन को चाहिए कि वह केंद्रों पर तैनात कर्मचारियों को निर्देश दे कि केवल अधिमान्य या संस्थान के वैध पहचान पत्र वाले पत्रकारों को ही जानकारी दें। साथ ही, अवैध वसूली करने वालों के खिलाफ रंगदारी का मामला दर्ज किया जाए। ‘
पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है, उगाही का जरिया नहीं। सिवनी जिले में फल-फूल रहा यह ‘500-1000 रुपये का खेल’ न केवल अपराध है, बल्कि उन कलमकारों का अपमान है जो दिन-रात मेहनत कर समाज का आईना बनते हैं। यदि समय रहते इन ‘तथाकथितों’ पर लगाम नहीं लगाई गई, तो पत्रकारिता की साख पूरी तरह मिट्टी में मिल जाएगी।