सांदीपनि स्कूलों में व्यवस्था का इंतजार: दो साल से गणवेश नहीं, रसोई के बावजूद बाहर से भोजन; जिम्मेदारों के बच्चों पर भी सवाल
नया सत्र शुरू हुए तीन माह से अधिक बीते, छह विद्यालयों के करीब 2,785 विद्यार्थी प्रभावित
राष्ट्र चंडिका न्यूज़, सिवनी। जिले के सांदीपनि विद्यालयों को सरकारी शिक्षा व्यवस्था का बेहतर और आधुनिक मॉडल बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की कई बुनियादी जरूरतें अब भी व्यवस्था की सुस्ती में अटकी हुई हैं। जिले के छह सांदीपनि विद्यालयों में कक्षा केजी-1 से आठवीं तक अध्ययनरत करीब 2,785 विद्यार्थी दो साल से नई गणवेश का इंतजार कर रहे हैं। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए तीन माह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक नई गणवेश का वितरण नहीं हो पाया है।
स्थिति यह है कि कई बच्चे पुरानी गणवेश पहनकर ही स्कूल पहुंच रहे हैं। दो साल में बच्चों के कद और शरीर में बदलाव होने के कारण विशेषकर छोटे विद्यार्थियों की पुरानी ड्रेस अब छोटी और तंग हो चुकी है। कुछ बच्चों की गणवेश फटने की स्थिति में भी पहुंच गई है। इसके बावजूद नई गणवेश नहीं मिलने से विद्यार्थियों और अभिभावकों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
छह विद्यालयों के 2,785 विद्यार्थी प्रभावित
जिले के धनौरा, छपारा, धूमा, सिवनी, सुकतरा और केवलारी के सांदीपनि विद्यालय इस समस्या से प्रभावित हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार धनौरा में करीब 250, छपारा में 1,100, धूमा में 482, सिवनी में 400, सुकतरा में 283 और केवलारी में करीब 270 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।गणवेश का मामला किसी एक स्कूल या कुछ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों बच्चों की बुनियादी सुविधा से जुड़ा हुआ है।
रेडीमेड गणवेश में भी आई थी साइज की समस्या
गणवेश वितरण की व्यवस्था पहले भी सवालों के घेरे में रही है। शुरुआती दौर में विद्यार्थियों को रेडीमेड गणवेश दी गई थी, लेकिन कई बच्चों को उनकी नाप के अनुसार ड्रेस नहीं मिल सकी। कहीं ड्रेस छोटी थी तो कहीं साइज बड़ा या अनुपयुक्त था।
समस्या बढ़ने पर कुछ अभिभावकों ने अपने स्तर पर विद्यालय की गणवेश से मिलते-जुलते कपड़े खरीदकर बच्चों की ड्रेस सिलवाई। इससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ा। अब दो साल बाद भी नई गणवेश का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।
पत्राचार जारी, लेकिन तारीख अब तक तय नहीं
गणवेश को लेकर विभागीय स्तर पर पत्राचार किए जाने की बात सामने आ रही है, लेकिन अभिभावकों का कहना है कि केवल पत्राचार से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्हें यह स्पष्ट जानकारी चाहिए कि नई गणवेश कब तक मिलेगी।
बताया जा रहा है कि विद्यार्थियों की नाप के अनुसार गणवेश तैयार कराकर वितरण किया जाना है। ऐसे में सवाल है कि प्रक्रिया अभी किस चरण में है और इसे पूरा करने की अंतिम समय सीमा क्या है। अभिभावकों की मांग है कि सभी बच्चों की वर्तमान नाप लेकर गुणवत्तापूर्ण गणवेश जल्द उपलब्ध कराई जाए।
कंडीपार में रसोई होने के बावजूद बाहर से पहुंच रहा मध्याह्न भोजन
गणवेश के साथ सिवनी के कंडीपार सांदीपनि विद्यालय की मध्याह्न भोजन व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। विद्यालय परिसर में रसोई की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद भोजन बाहर से बनकर स्कूल पहुंचने की जानकारी सामने आई है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब विद्यालय परिसर में रसोई मौजूद है तो भोजन बाहर से क्यों तैयार कराया जा रहा है? विद्यालय में ही भोजन तैयार होने पर उसकी ताजगी, स्वच्छता, गुणवत्ता और वितरण व्यवस्था की निगरानी अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
अभिभावकों की मांग है कि इस व्यवस्था की जांच की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि स्कूल की रसोई का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है। साथ ही यह भी देखा जाए कि विद्यार्थियों को निर्धारित मेन्यू, मात्रा और गुणवत्ता के अनुसार भोजन मिल रहा है या नहीं।
भोजन में गुणवत्ता और पोषण भी जरूरी
मध्याह्न भोजन का उद्देश्य केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उनकी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करना भी है। इसलिए भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, स्वच्छता और निर्धारित मेन्यू का पालन महत्वपूर्ण है।
विद्यालयों में मध्याह्न भोजन व्यवस्था की नियमित निगरानी और मौके पर जांच होना जरूरी है, ताकि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और स्वच्छ भोजन मिल सके।
सरकारी स्कूलों पर भरोसा बढ़ा, अब व्यवस्था की परीक्षा
सांदीपनि विद्यालयों को लेकर अभिभावकों में रुचि बढ़ना सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। बड़ी संख्या में अभिभावक इन विद्यालयों में अपने बच्चों का प्रवेश कराना चाहते हैं। लेकिन दूसरी ओर गणवेश जैसी मूलभूत सुविधा के लिए दो साल का इंतजार और रसोई उपलब्ध होने के बावजूद बाहर से भोजन पहुंचना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।अब सवाल यह है कि जिन स्कूलों को आधुनिक और बेहतर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पहचान के रूप में विकसित किया जा रहा है, वहां बच्चों को बुनियादी सुविधाएं समय पर क्यों नहीं मिल पा रही हैं?
नेताओं-अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं?
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर चर्चा के बीच यह सवाल भी उठता रहा है कि जिन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी है, क्या वे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए इन्हीं स्कूलों पर भरोसा करते हैं?
यदि जिले में कलेक्टर, एसपी सहित वरिष्ठ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों के विद्यालयों को लेकर पारदर्शी सर्वे कराया जाए तो यह भी सामने आ सकता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर जिम्मेदार वर्ग का वास्तविक भरोसा कितना है।
यह मुद्दा किसी परिवार के निजी फैसले से ज्यादा सरकारी व्यवस्था में विश्वास और जवाबदेही से जुड़ा सवाल है। यदि जिम्मेदार वर्ग के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ें तो स्कूलों की व्यवस्थाओं, शिक्षकों की उपस्थिति, साफ-सफाई, भोजन और अन्य सुविधाओं की निगरानी को लेकर जवाबदेही और मजबूत हो सकती है।
अब आश्वासन नहीं, समयबद्ध कार्रवाई की जरूरत
अभिभावकों की मांग है कि गणवेश वितरण की स्पष्ट तारीख सार्वजनिक की जाए और विद्यार्थियों की वर्तमान नाप के अनुसार जल्द गुणवत्तापूर्ण गणवेश उपलब्ध कराई जाए। साथ ही कंडीपार सांदीपनि विद्यालय की मध्याह्न भोजन व्यवस्था की जांच कर रसोई के उपयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट की जाए।
सांदीपनि विद्यालयों को केवल नाम बदलने या योजनाओं की घोषणा से बेहतर नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों को समय पर गणवेश मिले, उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग हो, मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित हो और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। दो साल से गणवेश का इंतजार अब सामान्य देरी नहीं कही जा सकती। अभिभावकों को अब आश्वासन नहीं, तारीख और जमीन पर कार्रवाई चाहिए।