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बदले का हौवा बनाम जाति जनगणना का शिगूफा: युद्ध से ध्यान भटकाने की रणनीति?

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पहलगाम का हमला और बदले का अधूरा वादा
कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले को दो सप्ताह बीत चुके हैं। 26 बेगुनाहों की जान गई, देश दहला, लेकिन क्या बदले की कोई ठोस कार्रवाई हुई? मोदी सरकार की हाई लेवल बैठकें, गृहमंत्री के बयान, रक्षा विशेषज्ञों की टीवी बहसें… मगर ज़मीनी हकीकत? सिर्फ 8-9 आतंकियों के घर ढहाए गए। ना पाकिस्तान पर कोई सीधा प्रहार, ना कोई सर्जिकल स्ट्राइक।

राष्ट्र चंडिका न्यूज़, ,कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को दो सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। नौ निर्दोषों की मौत के बाद पूरा देश सन्न रह गया। जनता, जो अब हर आतंकी वारदात के बाद अबकी बार कुछ बड़ा होगा की उम्मीद में टीवी पर नजरें गढ़ा लेती है, इस बार भी वही कर रही है—लेकिन हाथ कुछ नहीं आया।
मोदी मीडिया नामक प्रोपेगेंडा मशीनरी ने शुरुआत में जिस तीव्रता से हवा बनाई, उसमें दावा किया गया कि भारत जल्द ही ऐसा बदला लेगा, जो इतिहास में दर्ज होगा। मगर अब तक केवल 8-9 आतंकियों के घर तोड़े गए हैं। कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव की बात नहीं। केवल बैठकों का अम्बार-रोजाना 3-4 उच्चस्तरीय बैठकें—पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं। क्या यह जनता के साथ  भावनात्मक खिलवाड़ नहीं है? जब हमला हुआ, तब सरकार और मीडिया दोनों ने दावा किया-अबकी बार कुछ बड़ा होगा!लेकिन दो हफ्ते बाद भी कोई ठोस सैन्य जवाब नहीं आया। क्या दुश्मन को सबक सिखाने की रणनीति खत्म हो चुकी है? या फिर सरकार खुद किसी असमंजस में है?
चूक की जवाबदेही कौन लेगा?
सबसे बड़ा सवाल: आखिर सुरक्षा में हुई चूक की जवाबदेही कौन लेगा? पर्यटक क्षेत्र में इस तरह की घटना राष्ट्रीय शर्म है। क्या खुफिया एजेंसियां नाकाम रहीं? क्या स्थानीय प्रशासन विफल रहा? या फिर राजनीतिक नेतृत्व ने खतरे की अनदेखी की?
सरकार की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया। किसी मंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी नहीं ली। सवाल ये भी है कि जब सत्ताधीश चुन-चुन कर मारेंगे जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या इसके पीछे ठोस रणनीति होती है या सिर्फ चुनावी शिगूफा?
जाति जनगणना:-डायवर्जन या डिविजन?
इसी बीच एक और राजनीतिक बम फूटा-जाति जनगणना की घोषणा। सवाल उठता है: क्या यह आतंकवाद और कश्मीर पर केंद्रित बहस से जनता का ध्यान भटकाने की सोची-समझी कोशिश है? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि संघ की मौन सहमति के बिना यह कदम संभव नहीं। सवाल यह है: क्या यह सामाजिक न्याय की ओर कदम है, या राजनीतिक जुगाड़? जाति-गणना कब होगी? क्या इसका कोई कानूनी आधार तय हुआ है? या ये सिर्फ चुनावी स्टंट है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित’ है। बिहार में चुनाव नजदीक हैं, और वहां जातीय समीकरण निर्णायक होते हैं। क्या यह फैसला महज राज्य विशेष के मतदाताओं को साधने की कोशिश है? संघ की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं। क्या यह कदम उसकी सहमति से उठा है? क्या यह सत्ता की रणनीति का हिस्सा है-जिसमें जनता को कभी राष्ट्रवाद, कभी जातिवाद के नाम पर उलझाकर रखा जाए? नेताओं के बयानों में पाकिस्तान को 5 टुकड़ों में बांटने की बात कही जा रही है। सवाल है-क्या यह केवल मंचीय उत्तेजना है, या वाकई कोई रणनीतिक योजना बनाई जा रही है? क्या हमारे सैन्य और कूटनीतिक संस्थान इस तरह की योजना पर काम कर रहे हैं? अगर हाँ, तो इसकी शुरुआत कब होगी? और अगर नहीं, तो ऐसे बयानों का मकसद क्या है? देश आज दोहरी चुनौतियों से जूझ रहा है-बाहरी आतंक और आंतरिक राजनीति। कश्मीर में हर आतंकी हमला सिर्फ जान नहीं लेता, बल्कि सरकार की साख पर भी प्रहार करता है। दूसरी ओर, जाति जनगणना जैसे मुद्दे समाज को तोड़ सकते हैं, जबकि इनका इस्तेमाल राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए किया जा रहा है। जनता अब जागरूक है। उसे न केवल बदले के दिखावे से, बल्कि जाति के नाम पर बंटवारे की राजनीति से भी सतर्क रहना होगा।अब वक्त है कि सरकार बैठकों से आगे बढक़र एक्शन दिखाए।और मीडिया माहौल बनाने की बजाय, सच दिखाए।
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