आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का खलवाड़-भगवानों की प्रतिमाओं पर रीलों का खेल धार्मिक भावनाएं आहत भगवानों की प्रतिमाओं पर रीलों का खेल सनातन धर्म की आस्था पर चोट ?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का खलवाड़-भगवानों की प्रतिमाओं पर रीलों का खेल धार्मिक भावनाएं आहत भगवानों की प्रतिमाओं पर रीलों का खेल सनातन धर्म की आस्था पर चोट ?
“सोशल मीडिया पर इन दिनों सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं और तस्वीरों को लेकर बनाए जा रहे वीडियोज़ एक नई बहस छेड़ रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल करके, भगवानों को नाचते-गाते, दौड़ते या हास्यास्पद स्थितियों में दिखाया जा रहा है। ये वीडियोज़ रीलों के रूप में तेज़ी से वायरल हो रहे हैं और इन्हें लेकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचने की बात कही जा रही है।”
राष्ट्र चंडिका न्यूज़, सोशल मीडिया पर इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करके सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ बनाए जा रहे अजीबोगरीब और हास्यास्पद वीडियोज़ को लेकर देश भर में आक्रोश है। ये वीडियोज़ रीलों के रूप में तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिन्हें लोग लाइक और शेयर भी कर रहे हैं। इन हरकतों को आस्था का मज़ाक और संस्कृति का अपमान माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला ?
हाल के दिनों में, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर (AI)-जनरेटेड वीडियोज़ की बाढ़ आ गई है। इन वीडियोज में कभी गणेश जी को लड्डु के लिए बात करते हुए दिखाया जाता है, तो कभी उनकी प्रतिमाओं को बैसाखी के साथ। कुछ वीडियोज़ में मूर्तियों को मंदिर से बाहर निकलते या दौड़ लगाते हुए भी दिखाया जा रहा है। ये दृश्य न केवल अप्राकृतिक हैं, बल्कि धार्मिक आस्था को चोट पहुँचाने वाले भी हैं।
इन वीडियोज़ को बनाने वाले इसे क्रिएटिविटी और मनोरंजन का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन धर्मगुरु और आम जनता इस पर कड़ी आपत्ति जता रहे हैं। उनका कहना है कि ये वीडियोज़ न केवल धार्मिक आस्था का मज़ाक उड़ाते हैं, बल्कि हमारी अपमान करते हैं। हैं। संस्कृति और परंपराओं का भी
क्यों उठ रहे हैं सवाल ? यह ट्रेंड
कई गंभीर सवाल खड़े करता है आस्था और मज़ाक की सीमा क्या मनोरंजन के नाम पर
किसी की धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाना सही है? डिजिटल दुनिया में नैतिकता (AI) और तकनीक का इस्तेमाल कहाँ तक किया जाना चाहिए? क्या इसके लिए कोई नियम या कानून नहीं होने चाहिए?
धार्मिक नेताओं की चुप्पी पर सवाल ऐसे आपत्तिजनक वीडियोज़ पर देश के साधु-संतों और धार्मिक संगठनों की तरफ से कोई बड़ा विरोध क्यों नहीं हो रहा है?
सोशल मीडिया की यह दुनिया, जहाँ हर कोई अपने विचार और क्रिएटिविटी खुलकर पेश करता है, वहाँ धार्मिक प्रतीकों के साथ इस तरह का खिलवाड़ कई लोगों के लिए असहनीय हो रहा है।
इन वीडियोज़ को बनाने वाले इसे रचनात्मकता और मनोरंजन का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन धर्मगुरुओं और आम जनता का कहना है कि यह आस्था का सीधा मज़ाक है। उनका तर्क है कि अगर किसी और धर्म के प्रतीकों के साथ ऐसा किया जाता, तो बड़ा विवाद खड़ा हो जाता।
साधु-संतों की चुप्पी पर सवाल
इस गंभीर मुद्दे पर देश के साधु-संतों
संगठनों की चुप्पी लोगों को हैरान कर रही है। जब किसी अन्य मुद्दे पर धर्म या आस्था की बात आती है, तो ये संगठन मुखर होकर अपनी राय रखते हैं, लेकिन ड्डू द्वारा किए जा रहे इस डिजिटल अपमान पर उनकी तरफ से कोई बड़ा विरोध या आंदोलन देखने को नहीं मिला है।
इस चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। धार्मिक नेताओं का मानना है कि ऐसे कृत्यों को रोकने के लिए उन्हें आगे आकर सख्त संदेश देना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी तकनीक का दुरुपयोग कर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का दुस्साहस न करे।
डिजिटल युग में नैतिकता और कानून की ज़रूरत यह घटना एक बार फिर डिजिटल दुनिया में नैतिकता और कानून की ज़रूरत को सामने लाती है। यह सवाल उठता है कि क्या तकनीक के इस्तेमाल की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? भारत में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर कानून के तहत कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन इन ड्ड वीडियोज़ पर कोई कार्रवाई होती नहीं दिख रही।
कानूनी पहलू और आगे की राह
भारत में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर कानून के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण है कि क्या इन वीडियोज़ को बनाने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है? इस पूरे मामले को लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सरकार को भी मिलकर काम करने की ज़रूरत है। धार्मिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए, एक संतुलन बनाना जरूरी है ताकि रचनात्मकता और आस्था, दोनों का सम्मान बना रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिलकर इस पर एक स्पष्ट नीति बनाने की ज़रूरत है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मनोरंजन के नाम पर किसी भी धर्म या आस्था का अपमान न हो। यह मामला सिर्फ रचनात्मकता का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और सम्मान का भी है।