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सिवनी नगर पालिका की चरम लापरवाही: इंदौर जैसी जल-त्रासदी की ओर बढ़ रहा शहर, दूषित पानी पीने को मजबूर जनता

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स्वच्छता और विकास के दावों के बीच सिवनी नगर पालिका प्रशासन की एक बेहद डरावनी और शर्मनाक तस्वीर सामने आ रही है। जिला मुख्यालय की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी जिस नगर पालिका पर है, उसके निकम्मेपन के कारण शहर की पाइपलाइनें अब ‘बीमारियों की सप्लाई लाइन’ बन चुकी हैं। शहर के अधिकांश वार्डों-बुधवारी बाजार, कटंगी रोड, मंगली पेठ, बारपत्थर क्षेत्र, बस स्टैंड, भैरोगंज और ‘प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में नलों से मटमैला, बदबूदार और दूषित पानी सप्लाई हो रहा है।

राष्ट्र चंडिका न्यूज़,सिवनी। स्वच्छता और विकास के दावों के बीच सिवनी नगर पालिका प्रशासन की एक बेहद डरावनी और शर्मनाक तस्वीर सामने आ रही है। जिला मुख्यालय की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी जिस नगर पालिका पर है, उसके निकम्मेपन के कारण शहर की पाइपलाइनें अब ‘बीमारियों की सप्लाई लाइन’ बन चुकी हैं। शहर के अधिकांश वार्डों बुधवारी बाजार, कटंगी रोड, मंगली पेठ,बारपत्थर क्षेत्र,  बस स्टैंड, भैरोगंज और ‘प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में नलों से मटमैला, बदबूदार और दूषित पानी सप्लाई हो रहा है।
इंदौर की घटना से भी नहीं सीखा सबक प्रशासन की यह लापरवाही किसी बड़े खतरे की आहट है। याद रहे कि कुछ समय पहले ही इंदौर के बाणगंगा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से कई मासूमों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हुए थे। उस घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था कि कैसे सीवेज का पानी पीने की पाइपलाइन में मिलकर त्रासदी ला सकता है। सिवनी में आज ठीक वैसे ही हालात बन रहे हैं। । क्या सिवनी नगर पालिका भी यहाँ इंदौर जैसी किसी बड़ी जनहानि का इंतज़ार कर रही है?


नगर पालिका का निकम्मापन और जनप्रतिनिधियों का ‘सरेंडर’
सिवनी नगर पालिका की लापरवाही अब किसी से छुपी नहीं है। पाइपलाइनें सड़ चुकी हैं, नालियों का पानी घरों में पहुँच रहा है, लेकिन सत्ता पक्ष के नेता और प्रभारी
प्रभारी नगर पालिका अध्यक्ष एसी कमरों में बैठकर ‘मूकदर्शक’ बने हुए हैं। ताज्जुब की बात यह है कि विपक्ष भी इस मुद्दे पर गूंगा-बहरा बना हुआ है। ऐसा लगता है कि सत्ता और विपक्ष ने मिलकर जनता को बीमारियों के हवाले करने का ‘अनुबंध’ कर लिया है।
नगर पालिका का प्रबंधन फेल-कागजों पर विकास, नलों में कीचड़ ? नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली पूरी तरह फेल साबित हो रही है। एक ओर जहाँ महाविद्यालय परिसर में तोरण द्वार और पेवर्स ब्लॉक जैसे सौंदर्यकरण के कार्यों के लिए लाखों की निविदाएं – निकाली जा रही हैं, वहीं बुनियादी जरूरत यानी ‘साफ पानी’ के लिए कोई इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही है।
दिखावटी मेंटेनेंस- फिल्टर प्लांट और क्लोरीनेशन की प्रक्रिया केवल फाइलों में चल रही है, हकीकत नलों से आने वाला गंदा पानी बयां कर रहा है।
अफसरों के दफ्तरों में क्रह्र डब्बों का पहरा, जनता के नसीब में दूषित पानी पानी नगर पालिका के निकम्मेपन की सबसे शर्मनाक तस्वीर यह है कि जिन अधिकारियों पर शुद्ध जल मुहैया कराने की जिम्मेदारी है, उन्हें खुद सरकारी सप्लाई पर भरोसा नहीं है।
दोहरा मापदंड- नगर पालिका और कलेक्ट्रेट के एसी कमरों में अधिकारियों के लिए बकायदा क्रह्र वाटर के सीलबंद डब्बे पहुँचते हैं।
घरों में भी पहरा- इन अधिकारियों के बंगलों पर भी सरकारी नलों के भरोसे काम नहीं चलता, वहां भी निजी कंपनियों के पानी के डब्बे सप्लाई होते हैं।
सरकारी कार्यक्रमों का ढोंग- किसी भी सरकारी कार्यक्रम या बैठक में चले जाइए, वहां अफसरों की मेज पर सरकारी नल का पानी नहीं, बल्कि ब्रांडेड सीलबंद पानी की बोतलें और डब्बे ही नजर आएंगे।
सवाल यह है कि यदि सरकारी फिल्टर प्लांट का पानी पीने लायक है, तो साहब इसे क्यों नहीं पीते और अगर यह पीने लायक नहीं है, तो जनता को यह जहर क्यों पिलाया जा रहा है?
शून्य जवाबदेही-जनता जब शिकायत लेकर दफ्तर पहुँचती है, तो जिम्मेदार अधिकारी जनता की सुनने के बजाय अपने वातानुकूलित कमरों में दुबके रहते हैं।

जनप्रतिनिधियों का रहस्यमयी मौन और विपक्ष की सुस्ती
इस पूरे संकट में सबसे दुखद पहलू स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रभारी नगर  पालिका अध्यक्ष का चुप्पी साध लेना है। चुनाव के समय घर-घर जाकर हाथ जोडऩे वाले नेता आज जनता को संकट में छोडक़र गायब हैं। वहीं, विपक्ष की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है। लोकतंत्र में पहरेदार की भूमिका निभाने के बजाय विपक्ष का मौन रहना सत्ता पक्ष के साथ ‘मौन समझौते’ की ओर इशारा कर रहा है। आखिर क्यों विपक्ष इस गंभीर मुद्दे पर नगर पालिका का घेराव नहीं कर रहा?

सत्ता का ‘मौन’ और विपक्ष की ‘सांठगांठ’
इस जल-संकट में जनप्रतिनिधियों की भूमिका सबसे शर्मनाक रही है। वोट के समय घर-घर हाथ जोडऩे वाले नेता आज जनता को तड़पता छोड़ गायब हैं। नगर पालिका अध्यक्ष ने इस गंभीर मुद्दे पर अब तक चुप्पी नहीं तोड़ी है।
हैरानी की बात तो यह है कि विपक्ष भी इस पूरे मामले में ‘रहस्यमयी मौन’ साधे हुए है। लोकतंत्र में पहरेदार की भूमिका निभाने के बजाय विपक्षी नेता केवल सोशल मीडिया पर फोटो डालने तक सीमित हैं। जनता पूछ रही है-क्या विपक्ष ने भी सत्ता पक्ष के साथ कोई ‘मौन अनुबंध’ कर लिया है?
विपक्ष पर प्रहार- विपक्ष की निष्क्रियता को उजागर किया गया है ताकि उन पर भी दबाव बने।

शिक्षा संस्थान भी खतरे में
’प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ के छात्र-छात्राएं और स्टाफ भी इस दूषित जलापूर्ति का शिकार हो रहे हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह शैक्षणिक संस्थान किसी बड़ी महामारी का केंद्र बन सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी नगर पालिका प्रशासन की होगी।

सीधा सवाल- क्या प्रशासन को जनता की जान की फिक्र है?
क्या सिवनी कलेक्टर और नगर पालिका सीएमओ की जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों और टेंडरों तक सीमित है जनता की जान की कीमत इन अधिकारियों और मौन बैठे जनप्रतिनिधियों के लिए कुछ भी नहीं?

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