अपराध की गिरफ्त में सिवनी-आखिर कब टूटेगा व्यवस्था का मौन?
राष्ट्र चंडिका न्यूज़,सिवनी। मध्य प्रदेश का सिवनी जिला, जिसे कभी अपनी शांति, सौहार्द और ‘शांति के टापू’ के रूप में पहचाना जाता था, आज अपराध की आग में झुलस रहा है। बीते कुछ महीनों के आंकड़ों और घटनाओं पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि जिले में कानून का खौफ खत्म हो चुका है। दिनदहाड़े चाकूबाजी, लूट, चोरी और हत्या की वारदातों ने आम नागरिक के मन में डर पैदा कर दिया है। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस गंभीर स्थिति पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही दलों के नेताओं ने ‘मौन’ साध रखा है।
अपराध के ग्राफ में डरावना उछाल -सिवनी के शहरी और ग्रामीण इलाकों में अपराध का स्वरूप बदल गया है।चाकूबाजी की बढ़ती संस्कृति: मामूली विवादों में भी अब सीधे चाकुओं का इस्तेमाल हो रहा है। युवाओं के बीच बढ़ती नशाखोरी और अवैध हथियारों की उपलब्धता ने शहर की सडक़ों को असुरक्षित बना दिया है।
लूट और चोरी का आतंक:
बंद घरों में चोरियां और राह चलते मोबाइल व चैन स्नैचिंग की घटनाएं अब आम बात हो गई हैं। व्यापारियों में भय है कि वे सुरक्षित ढंग से अपना व्यापार कैसे करें।
गंभीर हत्याएं: जिले में हाल के दिनों में हुई हत्याओं ने पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सिवनी जिले में हाल के समय में हुई अपराध की प्रमुख घटनाओं को अगर सिलसिलेवार तरीके से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि अपराधियों के हौसले क्यों बुलंद हैं। यहाँ उन प्रमुख घटनाओं का विवरण है जिन्होंने जिले को दहला दिया:
सरेराह चाकूबाजी और आपसी रंजिश-सिवनी शहर के शुक्रवारी, बरघाट रोड और नगरीय क्षेत्रों में छोटी-छोटी बातों पर चाकूबाजी की घटनाएं बढ़ी हैं। हाल ही में:कुछ युवाओं के गुटों में आपसी वर्चस्व को लेकर सरेआम विवाद हुआ, जिसमें खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन किया गया।
राह चलते लोगों से विवाद होने पर उन पर जानलेवा हमला करने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे आम जनता में असुरक्षा का भाव है।
लूट और रंगदारी
जिले के व्यापारियों और आम लोगों को निशाना बनाने वाली घटनाएं: रास्ते में लूट: नेशनल हाईवे और लिंक रोड्स पर देर शाम सफर करने वाले लोगों से मोबाइल और नकदी छीनने की वारदातों में इजाफा हुआ है।
रंगदारी: छोटे दुकानदारों और कारोबारियों से डरा-धमकाकर पैसे वसूलने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
चोरी की वारदातों में बढ़ोतरी
सिवनी जिले में पिछले कुछ महीनों में सुनसान घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया:पॉश कॉलोनियों से लेकर व्यस्त बाजारों तक, चोरों ने शटर और ताले तोडक़र लाखों के जेवरात और नकदी पार की।
पुलिस द्वारा इन चोरी के मामलों में बरामदगी की दर बहुत कम रही है, जिससे अपराधियों में कानून का डर खत्म हो गया है।
जघन्य हत्याएं और सनसनीजिले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में हुई हत्या की वारदातों ने शांति व्यवस्था की पोल खोल दी:
आदिवासी क्षेत्रों में विवाद: ग्रामीण इलाकों में जमीन या पुरानी रंजिश के चलते हत्या की घटनाएं हुई हैं।
शहर में हत्या: हालिया समय में हुई कुछ हत्याओं ने यह साबित किया कि जिले में अवैध हथियारों की पहुंच आसान हो गई है।
नशे का बढ़ता कारोबार
इन सभी अपराधों के पीछे सबसे बड़ी वजह अवैध नशे का व्यापार है:सिवनी में स्मैक, नशीली गोलियां और गांजे की बिक्री चरम पर है। नशे की लत को पूरा करने के लिए युवा चोरी, लूट और चाकूबाजी जैसे अपराधों में उतर रहे हैं। पुलिस ने कुछ छोटे तस्करों को पकड़ा है, लेकिन मुख्य सरगना अब भी पकड़ से बाहर हैं।
पुलिस और प्रशासन की सुस्ती
आरोप लग रहे हैं कि पुलिस की गश्त केवल मुख्य चौराहों और कागजों तक सीमित रह गई है। मोहल्लों और अंदरूनी सडक़ों पर बदमाशों का जमावड़ा लगा रहता है। नशे का काला कारोबार (गांजा, स्मैक और नशीली गोलियां) जिले की युवा पीढ़ी को अपराध की ओर धकेल रहा है, जिस पर पुलिस का शिकंजा कसने में नाकाम दिख रहा है।
जन-प्रतिनिधियों का ‘चुनावी मौन’-सबसे बड़ा सवाल उन नेताओं पर है जिन्हें जनता ने अपनी सुरक्षा और आवाज उठाने के लिए चुना है।
सत्ता पक्ष: भाजपा के नेता विकास कार्यों का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन बिगड़ती कानून व्यवस्था पर उनकी चुप्पी जनता को अखर रही है। गृह विभाग और शासन तक मजबूती से बात पहुँचाने की कमी साफ दिख रही है।
वपक्ष: कांग्रेस, जिसका काम सरकार की कमियों को उजागर करना है, वह भी इस मुद्दे पर केवल सोशल मीडिया या कागजी बयानों तक सीमित है। कोई बड़ा आंदोलन या विरोध प्रदर्शन न होना विपक्ष की सक्रियता पर सवाल उठाता है।
क्यों चुप हैं नेता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेताओं का मौन ‘राजनीतिक नफे-नुकसान’ और ‘अपराधियों को संरक्षण’ देने के गठजोड़ का परिणाम हो सकता है। कई बार स्थानीय अपराधियों के तार सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों से जुड़े होते हैं, जिसके कारण उन पर कार्रवाई के लिए दबाव नहीं बनाया जाता।
क्या कहता है सिवनी का नागरिक? अब शाम ढलने के बाद घर से बाहर निकलने में डर लगता है। पहले सिवनी ऐसा नहीं था।’ यह दर्द है उस आम नागरिक का जो आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। जनता का सवाल सीधा है— क्या नेता केवल वोट मांगने के वक्त ही नजर आएंगे? क्या उनकी जिम्मेदारी हमारे जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं है?
सिवनी की शांति अब केवल इतिहास के पन्नों में दबती जा रही है। अगर जल्द ही पुलिस प्रशासन ने अपराधियों पर कड़ा प्रहार नहीं किया और जन-प्रतिनिधियों ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब सिवनी की पहचान ‘अपराध के केंद्र’ के रूप में होने लगेगी। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जनता की सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए।
अपराध के ग्राफ में डरावना उछाल -सिवनी के शहरी और ग्रामीण इलाकों में अपराध का स्वरूप बदल गया है।चाकूबाजी की बढ़ती संस्कृति: मामूली विवादों में भी अब सीधे चाकुओं का इस्तेमाल हो रहा है। युवाओं के बीच बढ़ती नशाखोरी और अवैध हथियारों की उपलब्धता ने शहर की सडक़ों को असुरक्षित बना दिया है।
लूट और चोरी का आतंक:
बंद घरों में चोरियां और राह चलते मोबाइल व चैन स्नैचिंग की घटनाएं अब आम बात हो गई हैं। व्यापारियों में भय है कि वे सुरक्षित ढंग से अपना व्यापार कैसे करें।
गंभीर हत्याएं: जिले में हाल के दिनों में हुई हत्याओं ने पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सिवनी जिले में हाल के समय में हुई अपराध की प्रमुख घटनाओं को अगर सिलसिलेवार तरीके से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि अपराधियों के हौसले क्यों बुलंद हैं। यहाँ उन प्रमुख घटनाओं का विवरण है जिन्होंने जिले को दहला दिया:
सरेराह चाकूबाजी और आपसी रंजिश-सिवनी शहर के शुक्रवारी, बरघाट रोड और नगरीय क्षेत्रों में छोटी-छोटी बातों पर चाकूबाजी की घटनाएं बढ़ी हैं। हाल ही में:कुछ युवाओं के गुटों में आपसी वर्चस्व को लेकर सरेआम विवाद हुआ, जिसमें खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन किया गया।
राह चलते लोगों से विवाद होने पर उन पर जानलेवा हमला करने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे आम जनता में असुरक्षा का भाव है।
लूट और रंगदारी
जिले के व्यापारियों और आम लोगों को निशाना बनाने वाली घटनाएं: रास्ते में लूट: नेशनल हाईवे और लिंक रोड्स पर देर शाम सफर करने वाले लोगों से मोबाइल और नकदी छीनने की वारदातों में इजाफा हुआ है।
रंगदारी: छोटे दुकानदारों और कारोबारियों से डरा-धमकाकर पैसे वसूलने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
चोरी की वारदातों में बढ़ोतरी
सिवनी जिले में पिछले कुछ महीनों में सुनसान घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया:पॉश कॉलोनियों से लेकर व्यस्त बाजारों तक, चोरों ने शटर और ताले तोडक़र लाखों के जेवरात और नकदी पार की।
पुलिस द्वारा इन चोरी के मामलों में बरामदगी की दर बहुत कम रही है, जिससे अपराधियों में कानून का डर खत्म हो गया है।
जघन्य हत्याएं और सनसनीजिले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में हुई हत्या की वारदातों ने शांति व्यवस्था की पोल खोल दी:
आदिवासी क्षेत्रों में विवाद: ग्रामीण इलाकों में जमीन या पुरानी रंजिश के चलते हत्या की घटनाएं हुई हैं।
शहर में हत्या: हालिया समय में हुई कुछ हत्याओं ने यह साबित किया कि जिले में अवैध हथियारों की पहुंच आसान हो गई है।
नशे का बढ़ता कारोबार
इन सभी अपराधों के पीछे सबसे बड़ी वजह अवैध नशे का व्यापार है:सिवनी में स्मैक, नशीली गोलियां और गांजे की बिक्री चरम पर है। नशे की लत को पूरा करने के लिए युवा चोरी, लूट और चाकूबाजी जैसे अपराधों में उतर रहे हैं। पुलिस ने कुछ छोटे तस्करों को पकड़ा है, लेकिन मुख्य सरगना अब भी पकड़ से बाहर हैं।
पुलिस और प्रशासन की सुस्ती
आरोप लग रहे हैं कि पुलिस की गश्त केवल मुख्य चौराहों और कागजों तक सीमित रह गई है। मोहल्लों और अंदरूनी सडक़ों पर बदमाशों का जमावड़ा लगा रहता है। नशे का काला कारोबार (गांजा, स्मैक और नशीली गोलियां) जिले की युवा पीढ़ी को अपराध की ओर धकेल रहा है, जिस पर पुलिस का शिकंजा कसने में नाकाम दिख रहा है।
जन-प्रतिनिधियों का ‘चुनावी मौन’-सबसे बड़ा सवाल उन नेताओं पर है जिन्हें जनता ने अपनी सुरक्षा और आवाज उठाने के लिए चुना है।
सत्ता पक्ष: भाजपा के नेता विकास कार्यों का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन बिगड़ती कानून व्यवस्था पर उनकी चुप्पी जनता को अखर रही है। गृह विभाग और शासन तक मजबूती से बात पहुँचाने की कमी साफ दिख रही है।
वपक्ष: कांग्रेस, जिसका काम सरकार की कमियों को उजागर करना है, वह भी इस मुद्दे पर केवल सोशल मीडिया या कागजी बयानों तक सीमित है। कोई बड़ा आंदोलन या विरोध प्रदर्शन न होना विपक्ष की सक्रियता पर सवाल उठाता है।
क्यों चुप हैं नेता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेताओं का मौन ‘राजनीतिक नफे-नुकसान’ और ‘अपराधियों को संरक्षण’ देने के गठजोड़ का परिणाम हो सकता है। कई बार स्थानीय अपराधियों के तार सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों से जुड़े होते हैं, जिसके कारण उन पर कार्रवाई के लिए दबाव नहीं बनाया जाता।
क्या कहता है सिवनी का नागरिक? अब शाम ढलने के बाद घर से बाहर निकलने में डर लगता है। पहले सिवनी ऐसा नहीं था।’ यह दर्द है उस आम नागरिक का जो आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। जनता का सवाल सीधा है— क्या नेता केवल वोट मांगने के वक्त ही नजर आएंगे? क्या उनकी जिम्मेदारी हमारे जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं है?
सिवनी की शांति अब केवल इतिहास के पन्नों में दबती जा रही है। अगर जल्द ही पुलिस प्रशासन ने अपराधियों पर कड़ा प्रहार नहीं किया और जन-प्रतिनिधियों ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब सिवनी की पहचान ‘अपराध के केंद्र’ के रूप में होने लगेगी। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जनता की सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए।