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कांवड़ यात्रा: जहां मिट जाती हैं जाति और कुल-गोत्र की सीमाएं! जानें योगी सरकार में कैसे बनी सामाजिक समरसता की मिसाल

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प्रयागराज/काशी/अयोध्या: भगवान शिव को जलार्पण का अभीष्ट लेकर निकले कांवड़ियों के समूह को आंखें बंद कर आत्मसात कीजिए।, श्रद्धा और अटूट आस्था की वह अविरल धारा दृष्टिगोचर होगी जो प्रयागराज के महाकुंभ, अयोध्या में प्रभु श्रीरामलला के मंदिर परिसर, बांके बिहारी मंदिर प्रांगण तथा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में दिखाई देती है। हिंदू समाज की आंतरिक समरसता, सर्वसमावेशिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अद्भुत दृश्य वर्तमान में कांवड़ मार्गों पर जीवंत है। सदियों पुरानी सामाजिक सीमाएं और असमानताएं आस्था के इस पावन जल में विसर्जित हो चुकी हैं। कांवड़ियों के इस विशाल प्रवाह में कोई ब्राह्मण है, कोई दलित, कोई पिछड़ा तो कोई आदिवासी; कंधे पर बंधी कांवड़ किसी की जाति नहीं पूछती और रास्ते के अन्न-भंडारे किसी का कुल-गोत्र जांचकर प्रसाद वितरित नहीं करते। यह कांवड़ यात्रा भारत के सामाजिक अवचेतन का एक जीवंत मानचित्र है और उत्तर प्रदेश इसका प्रतिनिधित्व करता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह राज्य समावेशी हिंदू समाज के नव-जागरण का संवाहक बन चुका है।

🔱 ‘शिव तो देव, दानव, मानव, भूत, पिशाच सबके हैं’: सामाजिक विषमता को समाप्त करता शिवत्व

हिंदुत्व की सामाजिक-सांस्कृतिक व्याख्या करने वाले विचारक कांवड़ यात्रा को हिंदू समाज की आंतरिक समावेशिता के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखते हैं।

इसका मुख्य आधार यात्रा में दलितों और पिछड़ों की निरंतर बढ़ती अभूतपूर्व भागीदारी है। यह यात्रा सिद्ध करती है कि सनातन संस्कृति में ईश्वर की भक्ति हर उस आत्मा का सहज अधिकार है जो शिवत्व में विलीन होना चाहती है। भगवान शिव तो देव, दानव, मानव, भूत और पिशाच सभी के ‘विश्वनाथ’ और ‘भोलेनाथ’ हैं। वे स्वयं हलाहल विष अपने कंठ में धारण कर जगत की रक्षा करते हैं और औघड़दानी बनकर प्रत्येक भक्त पर समान अनुकंपा बरसाते हैं। कांवड़ मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति केवल ‘भोले का भक्त’ है; वहाँ उसकी कोई पृथक सामाजिक, आर्थिक या जातीय पहचान शेष नहीं रह जाती।

🛕 संत कबीर और संत रविदास की आध्यात्मिक समता का साकार रूप है कांवड़ यात्रा

दलित और पिछड़ा वर्ग, जो पूर्वकाल में कई सामाजिक व सांस्कृतिक अवसरों से वंचित रहा, आज इस यात्रा की मुख्य रीढ़ है।

योगी सरकार द्वारा दी गई समावेशी स्वीकृति और सम्मान ने उन्हें अपने सांस्कृतिक अधिकारों का सहज दावेदार बनाया है। जब लाखों की संख्या में युवा शिवभक्ति के इस महायज्ञ के मुख्य ध्वजवाहक बनते हैं, तो वे सिद्ध करते हैं कि सनातन धर्म का वास्तविक ढांचा किसी वर्चस्व पर नहीं, अपितु सहअस्तित्व और भ्रातृत्व पर आधारित है। भक्ति आंदोलन के दौर में संत कबीर, संत रविदास, संत चोखामेला और संत कनकदास ने जिस आध्यात्मिक समता की अलख जगाई थी, वही अलख आज कांवड़ यात्रा के रूप में सड़कों पर साकार हो रही है।

🚁 राजकीय संरक्षण और पुष्पवर्षा: उपेक्षा के दौर से निकलकर ‘सांस्कृतिक उत्सव’ बनी यात्रा

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने कांवड़ यात्रा को एक भव्य, सुरक्षित और गौरवमयी ‘सांस्कृतिक उत्सव’ का रूप प्रदान किया है।

यदि एक दशक पूर्व की बात करें, तो राज्य स्तर पर कांवड़ यात्रा को उपेक्षा, प्रशासनिक बाधाओं, सुरक्षा संबंधी खतरों और संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। वर्तमान सरकार ने इस दृष्टिकोण को मूल रूप से परिवर्तित किया है। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि आस्था का सम्मान करना और प्रत्येक नागरिक को उसकी धार्मिक परंपराओं हेतु सुरक्षित वातावरण देना राज्य का प्राथमिक दायित्व है। हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर की जाने वाली पुष्पवर्षा ने संपूर्ण समाज के मन में एक नया आत्मविश्वास और आत्मगौरव भर दिया है।

🌸 अध्यात्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तीकरण, ऊंच-नीच और छुआछूत का अंत

कांवड़ यात्रा के सुचारु संचालन हेतु की गई व्यापक प्रशासनिक व्यवस्थाएं—जैसे स्वच्छ व सुरक्षित मार्ग, प्राथमिक चिकित्सा शिविर, विश्राम स्थल, रोशनी के प्रबंध तथा भोजन-पानी की व्यवस्था—यह दर्शाती हैं कि राज्य सरकार अध्यात्म को सामाजिक सशक्तीकरण का सशक्त माध्यम मानती है।

मार्गों में संचालित सेवा शिविरों में जो निस्वार्थ भाव दिखाई देता है, वह समाज के भीतर से छुआछूत, ऊंच-नीच और वैमनस्य को जड़ से समाप्त करता है। केवल आर्थिक या राजनीतिक प्रयास तब तक पर्याप्त नहीं होते, जब तक आध्यात्मिक धरातल पर बराबरी का बोध न हो।

🌏 ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की ओर बढ़ता सनातन समाज, जातियों में बांटने वाली ताकतों को करारा जवाब

कांवड़ यात्रा का यह विहंगम स्वरूप भारत की उस अंतर्निहित शक्ति का दिग्दर्शन कराता है जो ‘विविधता में एकता’ और समरसता में अपने प्राण देखती है।

यह अभूतपूर्व सांस्कृतिक प्रवाह उन विघटनकारी शक्तियों को भी मुंहतोड़ जवाब है जो समाज को जातियों में विभाजित कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती हैं। संस्कृतिकरण और सामाजिक चेतना की यह पावन धारा समस्त समाज के एक साथ संगठित होने का पर्याय है, जो सनातन समाज को उसकी वास्तविक पहचान ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ के महान आदर्शों की ओर अग्रसर कर रही है।

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