बाघ का दर्द भरी दहाड़: जंगल नहीं, जख्म मिले
राष्ट्र चंडिका न्यूज़, सिवनी। एक बार फिर कान्हीवाड़ा क्षेत्र में एक घायल बाघ देखा गया है। ग्राम सेमरटोला में खेत में लेटे इस बाघ की जानकारी ग्रामीणों द्वारा वन विभाग को दी गई, जिसके बाद विभाग ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया।
बाघ के अगले पैर में गंभीर चोट थी, जिससे वह शिकार करने में अक्षम हो गया था। सूचना मिलते ही दक्षिण सिवनी सामान्य वनमंडल के अधिकारी गौरव मिश्रा ने सभी रेंजरों को मौके पर रवाना किया। पेंच टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश सिंह भी मौके पर पहुंचे। घायल बाघ किसी को अपने पास नहीं आने दे रहा था, जिससे रेस्क्यू अभियान को चुनौतीपूर्ण बना दिया।
लगभग 6 घंटे चले इस ऑपरेशन में उपवनमंडल अधिकारी योगेश पटेल के नेतृत्व में वन परिक्षेत्र केवलारी, सिवनी और कान्हीवाड़ा की टीमों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। बाघ को सुरक्षित पकड़कर भोपाल स्थित वन विहार भेज दिया गया है, जहाँ उसका इलाज और पुनर्वास किया जाएगा।
बढ़ते बाघ, घटते जंगल: एक गंभीर चिंता – यह मामला एक बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करता है। बाघों की संख्या में पिछले वर्षों में तेज़ी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश में जहाँ 526 बाघ थे, वहीं 2022 में यह संख्या बढ़कर 785 हो गई- यानी 48.56% की वृद्धि। लेकिन इसके विपरीत जंगलों की कटाई लगातार जारी है।
लोग तेजी से वनभूमि पर खेती और मकान निर्माण कर रहे हैं। बड़े झाड़ के जंगलों को काटा जा रहा है – उदाहरण के लिए केवलारी क्षेत्र में अकेले 172 पेड़ काटे जा चुके हैं।
मध्यप्रदेश सरकार टाइगर प्रोजेक्ट के अंतर्गत बाघों की संख्या बढ़ाने के प्रयास कर रही है, लेकिन बाघों को अपनी टैरेटरी के लिए घने जंगलों की आवश्यकता होती है। यदि बाघों की संख्या बढ़ती है और जंगल घटते हैं, तो मानवीय क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ना तय है।
बाघ संरक्षण की दिशा में सकारात्मक प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जंगलों का संरक्षण भी उतना ही ज़रूरी है। वरना घायल, भूखे और भटके हुए बाघों की संख्या बढ़ती जाएगी, जो इंसानों और वन्यजीवों -दोनों के लिए खतरा बन सकता है।