पत्रकारिता की आड़ में ‘वसूली गैंग’ सक्रिय; ग्रामीण अंचलों में बढ़ा फर्जी पत्रकारों का आतंक, साख बचाने की चुनौती
राष्ट्र चंडिका न्यूज़,सिवनी। जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण अंचलों में इन दिनों पत्रकारिता के नाम पर ‘अपराध का नया अध्याय’ लिखा जा रहा है। समाचार पत्र द्वारा फर्जी पत्रकारों के खिलाफ लगातार चलाई जा रही मुहिम का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। कई ग्राम पंचायतों ने बीते वर्ष खुलकर इन तथाकथित पत्रकारों की ब्लैकमेलिंग के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। आलम यह है कि अपराधी और असामाजिक तत्व गले में पोर्टल या यूट्यूब की आईडी लटकाकर सरकारी तंत्र और आम जनता को डरा-धमका रहे हैं।
बीते वर्ष पंचायतों ने खोली पोल: सेवा नहीं, वसूली है मकसद
बीते वर्ष में कई ग्राम पंचायतों से यह शिकायतें सामने आई हैं कि कुछ लोग, जो स्वयं को पत्रकार बताते हैं, विकास कार्यों में कमियां निकालकर अधिकारियों और सरपंच-सचिवों पर दबाव बनाते हैं। इनका उद्देश्य सुधार नहीं, बल्कि ‘चंदे’ के नाम पर अवैध वसूली करना है। सूत्रों के मुताबिक, इन दिनों खरीदी केंद्रों पर इन फर्जी पत्रकारों का जमावड़ा सबसे अधिक देखा जा रहा है, जहाँ ये किसानों और केंद्र प्रभारियों को बेवजह परेशान कर अपनी जेबें भर रहे हैं।
पुलिस और जनसंपर्क विभाग के समन्वय की दरकार
विडंबना यह है कि ये शातिर तत्व पुलिस और प्रशासन के सामने भी सीना तानकर खड़े रहते हैं, जिससे आम जनता भ्रमित हो जाती है। अब समय आ गया है कि:
सत्यापन अभियान: पुलिस विभाग को जिला जनसंपर्क कार्यालय (ष्ठक्कक्र) से अधिकृत और अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची प्राप्त कर सघन चेकिंग अभियान चलाना चाहिए।
15 दिन का विशेष अभियान: यदि पुलिस और प्रशासन केवल 15 दिन ईमानदारी से इन आईडी धारकों के दस्तावेजों और संस्थानों की सत्यता की जांच कर लें, तो जिले में सक्रिय सैकड़ों ‘कथित’ पत्रकार सलाखों के पीछे होंगे।
असली पत्रकारों की छवि पर गहराता संकट
पत्रकारिता जैसे पवित्र कार्य को इन ‘चोर-उचक्के’ किस्म के लोगों ने अपनी जीविका का साधन बना लिया है।
‘एक सच्चा पत्रकार अपने कार्यालय और अपनी नैतिक सीमाओं में रहकर जनहित की खबरें लिखता है। उसके पास इतना समय नहीं है कि वह गांव-गांव जाकर लोगों को डराए। लेकिन असली पत्रकारों की इसी शालीनता का फायदा उठाकर ये अपराधी किस्म के लोग पत्रकारिता के चोले में अपराध को अंजाम दे रहे हैं। ‘
सरकारी तंत्र को उठानी होगी जिम्मेदारी
अधिकारी और कर्मचारी अक्सर इन फर्जी पत्रकारों के दबाव में आकर गलत समझौतों के लिए मजबूर हो जाते हैं। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को प्रश्रय न दे जिसके पास भारत सरकार के क्रहृढ्ढ (प्रेस रजिस्ट्रार) या अधिकृत न्यूज़ चैनल का प्रामाणिक नियुक्ति पत्र न हो।
अपील- न डरें, न दबें, सीधे पुलिस को सूचित करें
आम जनता और सरकारी कर्मचारियों को यह समझने की आवश्यकता है कि पत्रकारिता कोई ‘वसूली का लाइसेंस’ नहीं है। यदि कोई व्यक्ति खुद को पत्रकार बताकर डराता है, तो तत्काल उसकी आईडी की फोटो खींचें और नजदीकी थाने या पत्रकार संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारियों को सूचित