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संगठनों की शह पर पनप रहे ‘कथित’ पत्रकार; रक्षक ही बन रहे भक्षक, सिवनी पत्रकारिता में गहराया साख का संकट

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राष्ट्र चंडिका न्यूज़,सिवनी। जिला मुख्यालय सहित पूरे जिले में इन दिनों ‘कथित’ पत्रकारों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन इस कड़वे सच का सबसे काला पक्ष यह है कि इन तथाकथित पत्रकारों को पैदा करने और उन्हें ‘पत्रकार’ होने की मुहर लगाने का काम खुद स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संगठनों के कुछ रसूखदार पदाधिकारी ही कर रहे हैं। पत्रकारिता की शुचिता की बात करने वाले संगठन ही अब ‘फर्जी पत्रकारों’ की नर्सरी बन गए हैं।
संगठनों के ‘नाम’ पर बिक रही है ‘आईडी’
जांच और चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि अपनी राजनीति चमकाने और संख्या बल दिखाने के लिए कई संगठनों के पदाधिकारियों ने नियम-कायदों को ताक पर रख दिया है।
बगैर सत्यापन सदस्यता- अपराधी छवि वाले, अनपढ़ और ब्लैकमेलिंग की पृष्ठभूमि रखने वाले लोगों को भी संगठन का परिचय पत्र् (ढ्ढष्ठ ष्टड्डह्म्स्र) थमा दिया जाता है।
संगठनों की ढाल- जब ये कथित पत्रकार किसी अवैध काम में फंसते हैं, तो यही संगठन के पदाधिकारी ‘पत्रकार एकता’ के नाम पर उन्हें बचाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं।
स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक ‘नेक्सस’
यह खेल केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। जिले से लेकर भोपाल और दिल्ली तक बैठे संगठनों के कुछ तथाकथित आकाओं को केवल अपनी ‘फीस’ और ‘चंदे’ से मतलब है। स्थानीय स्तर: यहाँ के पदाधिकारी अपने गुट को मजबूत करने के लिए किसी भी व्यक्ति के हाथ में माइक पकड़ा देते हैं।
प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर- ऊपरी स्तर पर बैठे लोग बिना ग्राउंड रिपोर्ट लिए, केवल कागजों पर फर्जी संस्थानों के नाम पर सदस्यता बांट रहे हैं।
नियमों की धज्जियाँ- संगठन ही कर रहे उल्लंघन
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (क्कष्टढ्ढ) और जनसंपर्क विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी व्यक्ति को पत्रकार मानने से पहले उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड और संस्थान की प्रमाणिकता की जांच होनी चाहिए। लेकिन यहाँ:
क्रहृढ्ढ के बिना पत्रकार- जिन पोर्टल या सोशल मीडिया पेजों का कोई कानूनी आधार नहीं है, उनके संचालकों को संगठन में बड़े पद दिए जा रहे हैं।
नैतिकता का हनन- संगठन के संविधान में लिखा होता है कि अनैतिक कार्यों में लिप्त व्यक्ति को सदस्यता नहीं दी जाएगी, लेकिन सिवनी में इसका ठीक उल्टा हो रहा है।
असली पत्रकारों में आक्रोश-  ‘हमें पहचान का संकट ‘
वरिष्ठ और निष्पक्ष पत्रकारों का कहना है कि संगठनों की इस कार्यप्रणाली के कारण समाज में अब पत्रकारों को ‘वसूलीबाज’ की नजर से देखा जाने लगा है। जब संगठनों के शीर्ष लोग ही चंद रुपयों या राजनीतिक रसूख के लिए ‘तथाकथितों’ को ‘कथित पत्रकार’ घोषित करेंगे, तो लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में- हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन और पुलिस विभाग के पास भी इन ‘कार्डधारियों’ की कोई पुख्ता सूची नहीं है। अधिकारियों को पता है कि कौन ब्लैकमेलर है और कौन पत्रकार, लेकिन संगठनों के दबाव के कारण कार्रवाई करने से बचते हैं।
‘जब बाड़ ही खेत को खाने लगे, तो फसल को कौन बचाएगा? पत्रकार संगठनों को अपने भीतर झांकना होगा कि उन्होंने किन लोगों को अपनी सदस्यता की ढाल दे रखी है। ‘
एक व्यथित वरिष्ठ पत्रकार, सिवनी

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