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झारखण्ड

हजारीबाग की महिलाओं का कमाल! सात समंदर पार पहुंचेगी ‘सोहराय कला’, माटी की खुशबू को दुनिया में पहचान दिलाने की ठानी

हजारीबाग:जिले की प्रसिद्ध लोक कला सोहराय को दूर तलक तक पहुंचाने का बीड़ा महिलाओं ने उठाया है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऐसी महिलाओं के जज्बे को ईटीवी भारत भी सलाम करता है. हजारीबाग के चूरचू प्रखंड की जोराकाट की रहने वाली महिलाओं ने सोहराय कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. राष्ट्रपति भवन में भी इनके द्वारा बनाई गई कलाकृति को देखा जा सकता है.

दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हजारीबाग में कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस दौरान हजारीबाग की सोहराय कला का प्रचार-प्रसार करने वाली महिला कलाकारों को सम्मानित किया गया. सम्मान समारोह के बाद ईटीवी भारत की टीम ने महिला कलाकारों से बातचीत की.

5000 साल से अधिक पुराना है सोहराय कला का इतिहास

इस दौरान महिला कलाकारों ने बताया कि हजारीबाग के छोटे से गांव जोराकाट से निकलकर अब सोहराय कला देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गई है. यही नहीं राष्ट्रपति भवन में भी उनकी बनाई गई कलाकृति झारखंड के हजारीबाग को अलग पहचान दे रही है. महिलाओं ने बताया कि सोहराय हजारीबाग की अपनी लोक कला है. जिसका इतिहास 5000 साल से भी अधिक पुराना है. उस कला को वे सड़क के किनारे, सरकारी कार्यालय के दीवारों पर उकेर रही हैं, ताकि सोहराय कला के बारे में लोग अधिक से अधिक जान सकें.

सोहराय कला को पहचान दिलाने का बीड़ा

महिला कलाकारों का कहना है कि उनके पूर्वज इस कला को मिट्टी की दीवारों पर उकेरा करते थे. पूर्वजों से सोहराय कला सीख कर अब वे सोहराय कला को विभिन्न स्थानों पर उकेरने का काम कर रही हैं. महिलाओं ने कहा कि इस कला को दूर तलक तक पहुंचने में जो आनंद मिल रहा है उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है.

महिलाओं को किया गया पुरस्कृत

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐसी महिलाओं को पूरा देश सलाम कर रहा है. इस कड़ी में हजारीबाग में महिलाओं को पुरस्कृत किया गया. महिलाएं कहती हैं कि बड़कागांव के इसको गुफा में सोहराय कला को आज भी देखा जा सकता है. वह कला इसको गुफा से निकलकर मिट्टी के घरों की दीवारों पर जगह बनाई. धीरे-धीरे यह राष्ट्रपति भवन तक पहुंच चुकी है, जो इस कला की खूबसूरती को दर्शाता है.

हजारीबाग की यह महिलाएं निसंदेह काबिले तारीफ हैं, जो हजारीबाग की कलाकृति और यहां की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही हैं, ताकि इस कला को देशभर में पहचान मिल सके.

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