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अज्ञातवास में पांडवों की प्यास बुझाने प्रकट हुई थी बाणगंगा! शिवपुरी सिद्धेश्वर धाम में स्थापित हैं ओंकारेश्वर के महादेव

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शिवपुरी (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में छत्री रोड स्थित प्रसिद्ध सिद्धेश्वर महादेव मंदिर संपूर्ण अंचल की अगाध आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र है। जाधव सागर झील के पूर्वी तट पर बसा यह पवित्र देवालय सदियों प्राचीन है। स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिव्य परिसर में प्रवेश करते ही जिस अद्भुत मानसिक शांति और आत्मिक सुकून की अनुभूति होती है, उसकी बात ही अनुपम है। सावन का पावन मास हो या महाशिवरात्रि का पर्व, यहाँ श्रद्धालुओं का विशाल सैलाब उमड़ता है। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के उपरांत आयोजित होने वाला सिद्धेश्वर-बाणगंगा मेला शिवपुरी का सबसे बड़ा और प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है।

🏹 महाभारत कालीन इतिहास और 52 कुंडों का रहस्य, अर्जुन के बाण से प्रकट हुई थी ‘बाणगंगा’

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर और समीपस्थ बाणगंगा क्षेत्र का इतिहास द्वापर युग में महाभारत काल से जुड़ा हुआ है।

मंदिर के सेवादार बताते हैं कि पांडव अपने अज्ञातवास की अवधि में जब जंगलों में भ्रमण कर रहे थे, तब वे शिवपुरी और बैराड़ के सघन वनों में ठहरे थे। जब पांडवों को तीव्र प्यास लगी और आसपास जल का कोई स्रोत नहीं था, तब धनुर्धर अर्जुन ने अपने गांडीव पर बाण चढ़ाकर भूमि पर प्रहार किया। बाण लगते ही धरती का सीना चीरकर शीतल एवं पवित्र जलधारा फूट पड़ी। बाण के प्रहार से गंगा प्रकट होने के कारण इस स्थान को ‘बाणगंगा’ कहा गया, जो आज भी अपने 52 पवित्र कुंडों के लिए अंचल भर में प्रसिद्ध है।

🔱 ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर से लाकर स्थापित किया गया था शिवलिंग, गुरु गोरखनाथ ने की थी कठिन तपस्या

सिद्धेश्वर मंदिर के गर्भगृह में विराजित अलौकिक शिवलिंग के विषय में मान्यता है कि इसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रसिद्ध ओंकारेश्वर धाम से लाकर यहाँ पूरे विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया था।

मंदिर परिसर में भगवान श्री गणेश, कार्तिकेय, राम-जानकी, राधा-कृष्ण तथा लक्ष्मी-नारायण की अत्यंत दुर्लभ एवं प्राचीन प्रतिमाएं भी सुशोभित हैं। मंदिर के ठीक पीछे स्थित गुरु गोरखनाथ मंदिर में 12वीं शताब्दी की सिद्ध गोरखनाथ जी की प्रतिमा स्थापित है। लोक मान्यताओं के अनुसार स्वयं गुरु गोरखनाथ जी ने इस पवित्र स्थान पर बैठकर कठिन तपस्या की थी।

👑 सिंधिया राजवंश और महारानी बैजाबाई का योगदान, सीधी रेखा में स्थित हैं शिवपुरी के 4 प्रमुख स्थल

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार आज मंदिर का जो भव्य एवं नयनाभिराम स्वरूप दृष्टिगोचर होता है, उसका जीर्णोद्धार 19वीं शताब्दी में सिंधिया राजवंश के शासनकाल के दौरान हुआ था।

दौलतराव सिंधिया की धर्मपत्नी महारानी बैजाबाई सिंधिया ने शिवपुरी में कई प्राचीन शिव मंदिरों का निर्माण व संरक्षण कराया था, जिनमें से सिद्धेश्वर मंदिर प्रमुख था। स्थापत्य कला की दृष्टि से शिवपुरी का प्रसिद्ध भदैया कुंड, सिंधिया राजवंश की छतरियां, जाधव सागर और सिद्धेश्वर मंदिर—ये सभी ऐतिहासिक स्थल एक सीधी भौगोलिक रेखा में स्थित हैं।

🪔 साधु-संतों की प्राचीन तपोभूमि, ओंकारेश्वर शिवलिंग व बाणगंगा कुंडों के दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएं

लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व मंदिर का संपूर्ण परिवेश सघन बीहड़ वनों से आच्छादित था, जहाँ महान सिद्ध साधु-संतों का निरंतर निवास रहता था।

सावन के महीने में श्रद्धालु कई किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा कर कांवड़ में जल लाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। विजयादशमी के अवसर पर यहाँ रावण दहन की परंपरा बड़े धूमधाम से निभाई जाती है। सनातन मान्यता है कि ओंकारेश्वर से आए इस दिव्य शिवलिंग और बाणगंगा के 52 पवित्र कुंडों के दर्शन-पूजन मात्र से ही श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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