राष्ट्र चंडिका न्यूज़ टीम, सिवनी सिवनी जिले की जनता एक बार फिर उम्मीदों के साथ प्रभारी मंत्री करणसिंह वर्मा के आगमन की ओर देख रही थी, लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। विकास कार्यों में ठहराव और जनसमस्याओं के प्रति बढ़ती उदासीनता के बीच मंत्री जी का प्रवास किसी समाधान का संदेश नहीं, बल्कि एक और ‘तबादला यात्रा’ बनकर रह गया।
जनता बेहाल, सिस्टम लाचार – ग्रामीण इलाकों में सड़कों, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी जस का तस बना हुआ है। लोग दूर-दराज से जनसुनवाई में पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें समाधान की बजाय केवल ‘जांच’ और ‘आश्वासन’ मिलता है। स्थानीय नागरिकों में यह धारणा गहराती जा रही है कि सरकार की प्राथमिकता अब जनहित नहीं, बल्कि प्रशासनिक समीकरण साधना बन चुकी है।
तबादला ही लक्ष्य? – सूत्रों की मानें तो बीते पंद्रह दिनों से जिले में तबादलों को लेकर हलचल तेज है। अफसरों-कर्मचारियों की सूची तैयार हो रही है और बैठकें केवल इस एजेंडे पर केंद्रित हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि प्रभारी मंत्री का यह दौरा भी जनहित नहीं, बल्कि ‘स्थानांतरण हित’ से प्रेरित है। जिस मंत्री को जनता की समस्याएं सुननी चाहिए, वही अब ‘फाइलों की राजनीति’ में व्यस्त नजर आ रहे हैं।
भ्रष्टाचार की आहट? – लोकल प्रशासन में भी यह चर्चा आम हो गई है कि तबादलों के पीछे ‘उगाही की रणनीति’ सक्रिय हो चुकी है। आरोप लग रहे हैं कि अब भाजपा नेताओं की प्राथमिकता पारदर्शिता नहीं, बल्कि स्थानांतरण नीति के माध्यम से निजी लाभ अर्जित करना है।
सवालों के घेरे में मंत्री जी का प्रवास – शनिवार को एक बार फिर प्रभारी मंत्री सिवनी पहुंचे हैं। लेकिन अब जनता यह जानना चाहती है कि उनका यह दौरा क्या वाकई जनसेवा के लिए है, या फिर यह भी तबादला पोर्टफोलियो के अपडेट का हिस्सा है?
निष्क्रिय नेतृत्व, गहराता असंतोष – प्रभारी मंत्री की निष्क्रियता और तबादलों पर बढ़ता फोकस यह संकेत दे रहा है कि सिवनी की आम जनता फिलहाल शासन की प्राथमिकता में नहीं है। जिले को एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो न सिर्फ ज़मीनी हकीकत को समझे, बल्कि संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ उसे हल करने की दिशा में काम करे।
प्रभारी मंत्री के लगातार प्रवासों के बावजूद यदि जनता को सिर्फ वादे और अफसरों को तबादले मिल रहे हैं, तो यह लोकतंत्र नहीं, नौकरशाही की चतुराई और राजनीति की चालाकी का संकेत है। सवाल यही है—क्या सिवनी अब भी किसी जननेता की बाट जोह रहा है?